कर्नल हार्लैंड सैंडर्स: KFC के संस्थापक की संघर्ष भरी जीवन और कठिनाइयों से भरी प्रेरक यात्रा

 केंटकी फ्राइड चिकन (KFC) आज दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट फूड चेन है, जिसके लाखों आउटलेट्स हैं और अरबों का कारोबार। लेकिन इस साम्राज्य के पीछे एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने जीवन भर संघर्ष किया, असफलताओं का सामना किया और 65 साल की उम्र में सब कुछ खोकर भी हार नहीं मानी। वह व्यक्ति थे कर्नल हार्लैंड डेविड सैंडर्स। उनकी जीवन यात्रा बताती है कि सफलता उम्र, गरीबी या असफलताओं की मोहताज नहीं होती—बस दृढ़ संकल्प और मेहनत चाहिए। यह कहानी संघर्ष, धैर्य और कभी न रुकने की प्रेरणा है।



बचपन की गरीबी और परिवार की जिम्मेदारी

हार्लैंड सैंडर्स का जन्म 9 सितंबर 1890 को अमेरिका के इंडियाना राज्य के हेनरीविले में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता विल्बर सैंडर्स एक मामूली किसान थे, जो छोटे-मोटे काम करके परिवार चलाते थे। घर में तीन बच्चे थे—हार्लैंड सबसे बड़े। जब हार्लैंड सिर्फ 5 साल के थे, तब उनके पिता की मौत हो गई। अचानक परिवार पर मुसीबत आ गई। माँ मार्गरेट को फैक्ट्री में काम करना पड़ा, दिन भर घर से बाहर रहतीं। छोटी उम्र में ही हार्लैंड पर घर और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई।

वे सुबह उठकर भाई-बहनों को खाना बनाते, घर संभालते और खुद भी काम ढूंढते। सिर्फ 10 साल की उम्र में वे एक फार्म पर काम करने लगे—दिन भर खेतों में मेहनत, महीने के कुछ डॉलर। स्कूल जाना मुश्किल हो गया। छठी क्लास के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। गरीबी इतनी कि कभी-कभी खाने को भी तरसते। लेकिन इसी संघर्ष ने उन्हें खाना बनाने का शौक दिया। माँ से सीखा चिकन फ्राई करना, सब्जियाँ पकाना। वे कहते थे, “गरीबी ने मुझे मेहनत करना सिखाया, और खाना बनाने ने जिंदगी बचाई।” यह शुरुआती कठिनाई जीवन भर की आधार बनी।

युवावस्था में बार-बार नौकरियाँ और असफलताएँ

स्कूल छोड़ने के बाद हार्लैंड ने जीवन यापन के लिए तरह-तरह की नौकरियाँ कीं। 12 साल की उम्र में वे घर से भाग गए और फार्म हैंड बने। फिर स्ट्रिटकार कंडक्टर, रेलरोड फायरमैन (ट्रेन में कोयला डालने वाला), आर्मी में सैनिक (क्यूबा में), ब्लैकस्मिथ हेल्पर, इंश्योरेंस सेल्समैन—कुल मिलाकर 40 से ज्यादा नौकरियाँ बदलीं। कई जगहों से निकाल दिए गए क्योंकि या तो काम ठीक नहीं लगता या झगड़ा हो जाता।

एक बार रेलरोड में काम करते हुए वे इतने थक जाते कि सो जाते, और नौकरी गई। इंश्योरेंस बेचते हुए अच्छा कमाते, लेकिन कंपनी बंद हो गई। वे कानून की पढ़ाई भी करने लगे, लेकिन कोर्ट में विरोधी वकील से लड़ाई हो गई और केस छोड़ना पड़ा। शादी की, दो बेटियाँ और एक बेटा हुआ, लेकिन परिवार चलाना मुश्किल। पत्नी क्लॉडिया कई बार कहतीं, “तुम स्थिर हो जाओ।” लेकिन हार्लैंड में कुछ करने की बेचैनी थी। ये साल असफलताओं के थे—हर बार उम्मीद जगती और टूट जाती। लेकिन वे कभी रुके नहीं।



40 की उम्र में पहली उम्मीद: गैस स्टेशन और खाना

1930 में, 40 साल की उम्र में हार्लैंड ने केंटकी के कॉर्बिन में एक गैस स्टेशन खोला। ग्रेट डिप्रेशन का समय था—अर्थव्यवस्था डूबी हुई। लेकिन स्टेशन चल निकला। आने-जाने वाले ट्रक ड्राइवर्स को वे घर का बना खाना परोसने लगे। उनका फ्राइड चिकन इतना मशहूर हुआ कि लोग दूर से आते। स्टेशन के पीछे एक छोटा रेस्टोरेंट बनाया—सैंडर्स कोर्ट एंड कैफे।

यहाँ उन्होंने अपनी सीक्रेट रेसिपी विकसित की—11 जड़ी-बूटियाँ और मसाले। सामान्य फ्राइंग में घंटा लगता, लेकिन उन्होंने प्रेशर कूकर का इस्तेमाल किया, जिससे 15 मिनट में चिकन तैयार। 1935 में केंटकी के गवर्नर ने उन्हें “कर्नल” की सम्मानित उपाधि दी। व्यवसाय बढ़ा—140 सीटों वाला रेस्टोरेंट, मोटेल। लगता था अब जीवन संवर गया। लेकिन 1950 के दशक में नया इंटरस्टेट हाईवे बना, जिससे उनका इलाका सुनसान हो गया। ग्राहक कम हुए, कर्ज बढ़ा। अंत में रेस्टोरेंट नीलाम हो गया। 62 साल की उम्र में हार्लैंड दिवालिया हो गए।

सबसे बड़ी कठिनाई: 65 की उम्र में सब कुछ खोना और नई शुरुआत

1955 में, 65 साल की उम्र में हार्लैंड को पहला सोशल सिक्योरिटी चेक मिला—मात्र 105 डॉलर। घर बिक चुका था, बचत खत्म। पत्नी के साथ पुरानी कार में रहते। लेकिन हार्लैंड ने सोचा, “मेरी रेसिपी तो है।” वे अपनी सीक्रेट रेसिपी लेकर फ्रैंचाइजी बेचने निकले। सफेद सूट पहना, टाई लगाई, कार में प्रेशर कूकर और मसाले रखे। रेस्टोरेंट मालिकों के पास जाते, मुफ्त में चिकन बनाकर खिलाते और कहते, “अगर बिके तो प्रति चिकन 5 सेंट रॉयल्टी दो।”

लेकिन रिजेक्शन पर रिजेक्शन। 1009 बार “नहीं” सुना। कई रेस्टोरेंट वाले हँसते, कहते “बूढ़े आदमी, घर जाओ।” रातें कार में सोते, खाना खुद बनाते। पैसे इतने कम कि कभी भूखे रहते। एक बार तो आत्महत्या तक का ख्याल आया, लेकिन परिवार और सपने ने रोका। वे कहते थे, “मैंने हार नहीं मानी क्योंकि मुझे विश्वास था कि मेरी रेसिपी बेस्ट है।” आखिरकार 1960 में यूटा के एक रेस्टोरेंट मालिक पीट हार्मन ने हाँ कहा। फिर धीरे-धीरे फ्रैंचाइजी बढ़ी। 1964 में KFC के 600 से ज्यादा आउटलेट थे। हार्लैंड ने कंपनी 2 मिलियन डॉलर में बेच दी (आज के हिसाब से करोड़ों)।

सफलता के बाद भी संघर्ष और विरासत

सफलता मिली, लेकिन हार्लैंड खुश नहीं थे। नई मालिकों ने रेसिपी और क्वालिटी बदलने की कोशिश की। वे मुकदमे लड़ते रहे। अंत तक KFC का चेहरा बने रहे—विज्ञापनों में, स्टोर विजिट में। 90 साल की उम्र में 16 दिसंबर 1980 को उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी विरासत जीवित है—KFC आज 150 देशों में है।

कर्नल सैंडर्स की कहानी सिखाती है: जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ—गरीबी, नौकरी जाना, व्यवसाय फेल, उम्र ढलना—हार मत मानो। वे कहते थे, “मैं 65 में फेल हुआ, लेकिन तब सफल हुआ जब लोग रिटायर होते हैं।” “लोग असफलता से डरते हैं, लेकिन मैंने इसे सीढ़ी बनाया।”

यह यात्रा बताती है कि सपने कभी देर से नहीं पूरे होते, बस मेहनत जारी रखो। अगर आप संघर्ष में हैं, तो याद रखो—कर्नल की तरह आप भी जीत सकते हैं। उनकी उंगली चाटने लायक चिकन नहीं, बल्कि कभी न रुकने वाला जज्बा आज भी प्रेरित करता है।

अब्राहम लिंकन: संघर्ष भरा जीवन और कठिनाइयों से भरी प्रेरक यात्रा

 

अब्राहम लिंकन: संघर्ष भरा जीवन और कठिनाइयों से भरी प्रेरक यात्रा

अब्राहम लिंकन अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति थे, जिन्होंने गुलामी खत्म की और देश को गृहयुद्ध से बचाया। लेकिन उनका जीवन लगातार संघर्ष और कठिनाइयों की मिसाल है। गरीबी, असफलताएँ, व्यक्तिगत दुख और मानसिक पीड़ा से भरा उनका सफर बताता है कि दृढ़ संकल्प से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।

बचपन की गरीबी और पारिवारिक दुख

अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी 1809 को केन्टकी में एक गरीब किसान परिवार में एक छोटे से लॉग केबिन में हुआ। घर में कोई सुविधा नहीं थी—मिट्टी का फर्श, एक कमरा और संघर्षपूर्ण जीवन। उनके पिता थॉमस लिंकन मामूली किसान थे, जो परिवार चलाने के लिए जगह-जगह घूमते। लिंकन को बचपन से कड़ी मेहनत करनी पड़ी—लकड़ियाँ काटना, खेतों में काम करना।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वे सिर्फ 9 साल के थे—उनकी माँ नैन्सी की मौत हो गई। इसके बाद पिता ने दूसरी शादी की, और सौतेली माँ सारा ने उन्हें बहुत प्यार दिया, लेकिन गरीबी बनी रही। परिवार इंडियाना और फिर इलिनॉय शिफ्ट होता रहा। इन कठिनाइयों ने लिंकन को मजबूत बनाया, लेकिन अंदर एक उदासी हमेशा रही।

शिक्षा और आत्म-शिक्षा का संघर्ष

लिंकन को औपचारिक शिक्षा बहुत कम मिली—कुल मिलाकर एक साल से भी कम। स्कूल दूर थे, और परिवार की मजबूरी में वे काम करते। लेकिन पढ़ने की लगन ऐसी कि रात में चिमनी की रोशनी में किताबें पढ़ते। वे पैदल मीलों चलकर किताबें उधार लेते। कानून की किताबें पढ़कर खुद वकील बने। यह आत्म-शिक्षा का संघर्ष ही था जो उन्हें आगे ले गया।



व्यापार और राजनीति में बार-बार असफलताएँ

युवावस्था में लिंकन ने दुकानदारी शुरू की, लेकिन व्यापार फेल हो गया। कर्ज इतना कि वर्षों तक चुकाते रहे। वे पोस्टमास्टर बने, सर्वेयर बने, लेकिन स्थिरता नहीं मिली।

राजनीति में भी लगातार हार:

  • 1832 में राज्य विधानसभा चुनाव हारे।
  • 1840 के दशक में कई बार कांग्रेस के लिए कोशिश की, लेकिन असफल।
  • 1858 में सीनेट चुनाव लिंकन-डगलस डिबेट के बावजूद हारे।

लोग ताने मारते, लेकिन लिंकन कहते थे: "मैं असफलता से नहीं डरता, क्योंकि हर असफलता मुझे मजबूत बनाती है।"

व्यक्तिगत दुख और मानसिक पीड़ा

लिंकन को गहरी उदासी (मेलैंकोली) थी, जिसे आज डिप्रेशन कहते हैं। युवावस्था में प्रेमिका एन रटलेज की मौत से वे टूट गए। शादी मैरी टॉड से हुई, लेकिन चार बेटों में से तीन की मौत बचपन में ही हो गई। खासकर बेटे विली की मौत ने उन्हें तोड़ दिया। गृहयुद्ध के दौरान तनाव इतना कि वे रातों में सो नहीं पाते थे।

सबसे बड़ी कठिनाई: अमेरिकी गृहयुद्ध

1861 में राष्ट्रपति बनने के बाद देश गृहयुद्ध में डूब गया। उत्तर और दक्षिण के बीच लड़ाई, लाखों मौतें। लिंकन पर पूरे देश की जिम्मेदारी थी। वे अकेलेपन और दबाव से जूझते। लेकिन दृढ़ता से गुलामी खत्म करने का फैसला किया—1863 में इमैंसिपेशन प्रॉक्लेमेशन जारी किया। गेटिस्बर्ग एड्रेस में कहा: "सरकार जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए होनी चाहिए।"

अंतिम संघर्ष: हत्या

युद्ध खत्म होने के सिर्फ दिनों बाद, 14 अप्रैल 1865 को फोर्ड थिएटर में जॉन विल्क्स बूथ ने उन्हें गोली मार दी। लिंकन की मौत हो गई, लेकिन उनकी विरासत जीवित रही।

लिंकन की यह यात्रा सिखाती है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ—गरीबी, हार, दुख या मानसिक पीड़ा—अगर इरादा मजबूत हो, तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है। वे कहते थे: "मैं धीरे चलता हूँ, लेकिन कभी पीछे नहीं हटता।"

आपके जीवन में भी संघर्ष होंगे, लेकिन लिंकन की तरह उन्हें सीढ़ी बनाइए। मेहनत और धैर्य से सफलता जरूर मिलेगी।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: संघर्ष भरा जीवन और कठिनाइयों से भरी प्रेरक यात्रा

 डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष और कठिनाइयों की जीती-जागती मिसाल है। वे गरीबी से उठे, असफलताओं से लड़े, आलोचनाओं को सहा, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उनकी कहानी बताती है कि जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन दृढ़ संकल्प से उन्हें पार किया जा सकता है।



बचपन की गरीबी और मेहनत

कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम के एक गरीब परिवार में हुआ। घर में पैसे की तंगी इतनी थी कि बचपन से ही उन्हें काम करना पड़ा। सुबह-सुबह उठकर वे अखबार बाँटते थे ताकि परिवार की मदद कर सकें और अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सकें।

परिवार बड़ा था, घर छोटा और साधन सीमित। पिता नाव चलाते थे, लेकिन कमाई कम थी। फिर भी कलाम पढ़ाई में लगे रहे। वे कहते थे कि गरीबी ने उन्हें मेहनत की कीमत सिखाई। रामेश्वरम की गलियों में घूमते, समुद्र की लहरें देखते और पक्षियों की उड़ान से प्रेरणा लेते। ये कठिनाइयाँ ही बाद में उनके सपनों का आधार बनीं।

पढ़ाई और शुरुआती संघर्ष

पढ़ाई के लिए कलाम को कड़ी मेहनत करनी पड़ी। स्कूल में वे औसत छात्र थे, लेकिन जिज्ञासा बहुत थी। उच्च शिक्षा के लिए मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दाखिला लिया, लेकिन फीस के लिए बहन ने अपनी ज्वेलरी तक बेच दी। DRDO और ISRO में शुरुआती दिन भी आसान नहीं थे। पहली परियोजनाएँ असफल हुईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

सबसे बड़ी कठिनाई: परियोजनाओं में असफलता

सबसे बड़ा संघर्ष SLV-3 प्रोजेक्ट में आया। 1979 में पहला लॉन्च पूरी तरह असफल रहा। रॉकेट समुद्र में गिर गया। मीडिया ने कड़ी आलोचना की, लोग निराश हुए। कलाम पर बहुत दबाव था। वे खुद जिम्मेदार महसूस कर रहे थे। लेकिन उनके गुरु सतीश धवन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सारी जिम्मेदारी ली और कहा, “हम फिर कोशिश करेंगे।”

यह असफलता कलाम के लिए बहुत बड़ी कठिनाई थी। रात-दिन मेहनत, टीम का दबाव, देश की उम्मीदें—सब कुछ दाँव पर था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। देर रात तक काम करते, टीम को प्रेरित करते।

अगले साल 1980 में दूसरा लॉन्च सफल हुआ। भारत ने पहली बार स्वदेशी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुँचाया। यह सफलता उन कठिनाइयों का फल थी। कलाम कहते थे, “असफलता मेरी सबसे अच्छी शिक्षक रही।” इसके बाद भी मिसाइल प्रोजेक्ट्स में कई बार फेलियर आए, आलोचनाएँ हुईं, लेकिन वे डटे रहे।

सादा जीवन और व्यक्तिगत कठिनाइयाँ

कलाम का जीवन हमेशा सादा रहा। बड़े पदों पर रहते हुए भी वे छोटे कमरे में रहते, साधारण शाकाहारी भोजन करते। कोई लग्जरी नहीं। वे अकेले रहे, परिवार नहीं बसाया क्योंकि देश को अपना परिवार मानते थे। स्वास्थ्य की समस्याएँ भी आईं, लेकिन काम नहीं रुका।

युवाओं को प्रेरणा देना

अंतिम दिनों तक वे युवाओं से मिलते, प्रेरित करते। 2015 में शिलांग में लेक्चर देते हुए ही उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी प्रेरणा आज भी जीवित है।

कलाम की यह यात्रा सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयाँ और संघर्ष आएँगे—गरीबी, असफलता, आलोचना—लेकिन अगर इरादा मजबूत हो, तो कोई बाधा नहीं रोक सकती। वे कहते थे: “कठिनाइयाँ जीवन में आती हैं ताकि हम अपनी क्षमताओं को पहचानें। अगर आप हार नहीं मानते, तो सफलता जरूर मिलेगी।”

आपके जीवन में भी संघर्ष होंगे, लेकिन कलाम की तरह उन्हें अवसर बनाइए। सपने देखिए और मेहनत कीजिए—सफलता आपका इंतजार कर रही है।

मृत्यु क्यों आवश्यक है?

 मृत्यु क्यों आवश्यक है? 

हर कोई मृत्यु से डरता है, लेकिन जन्म और मृत्यु सृष्टि के नियम हैं... यह ब्रह्मांड के संतुलन के लिए आवश्यक है। इसके बिना, मनुष्य एक-दूसरे पर हावी हो जाते। कैसे? इस कहानी से जानिए... 

एक बार, एक राजा एक संत के पास गया, जो राज्य के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठे थे। राजा ने पूछा, "हे स्वामी! क्या कोई औषधि है जो अमरता दे सके? कृपया मुझे बताएं।" 

संत ने कहा, "हे राजा! आपके सामने जो दो पर्वत हैं, उन्हें पार कीजिए। वहाँ एक झील मिलेगी। उसका पानी पीने से आप अमर हो जाएंगे।" 

राजा ने पर्वत पार कर झील पाई। जैसे ही वह पानी पीने को झुके, उन्होंने कराहने की आवाज सुनी। आवाज का पीछा करने पर उन्होंने एक बूढ़े और कमजोर व्यक्ति को दर्द में देखा। 


राजा ने कारण पूछा, तो उस व्यक्ति ने कहा, "मैंने इस झील का पानी पी लिया और अमर हो गया। जब मेरी उम्र सौ साल की हुई, तो मेरे बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया। मैं पचास साल से यहाँ पड़ा हूँ, बिना किसी देखभाल के। मेरा बेटा मर चुका है, और मेरे पोते अब बूढ़े हो चुके हैं। मैंने खाना-पीना बंद कर दिया है, फिर भी जीवित हूँ।" 

राजा ने सोचा, "बुढ़ापे के साथ अमरता का क्या फायदा? अगर मैं अमरता के साथ यौवन भी प्राप्त कर सकूँ तो?" राजा वापस संत के पास गए और समाधान पूछा, "कृपया मुझे अमरता के साथ यौवन प्राप्त करने का उपाय बताएं।" 

संत ने कहा, "झील पार करने के बाद, आपको एक और पर्वत मिलेगा। उसे पार करिए, और एक पेड़ मिलेगा जिस पर पीले फल लगे होंगे। उन फलों में से एक खा लीजिए, और आपको अमरता के साथ यौवन भी मिल जाएगा।" 

राजा ने दूसरा पर्वत पार किया और एक पेड़ देखा, जिस पर पीले फल लगे थे। जैसे ही उन्होंने फल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्हें तेज बहस और लड़ाई की आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने सोचा, इस सुनसान जगह में कौन झगड़ सकता है? 

राजा ने चार जवान आदमियों को ऊंची आवाज़ में झगड़ते देखा। राजा ने पूछा, "तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो?" उनमें से एक बोला, "मैं 250 साल का हूँ और मेरे दाहिने वाले व्यक्ति की उम्र 300 साल है। वह मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा नहीं दे रहा।" 

जब राजा ने दाहिने वाले व्यक्ति से पूछा, उसने कहा, "मेरा पिता, जो 350 साल का है, अभी भी जीवित है और उसने मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया। तो मैं अपने बेटे को कैसे दूं?" 

उस आदमी ने अपने 400 साल के पिता की ओर इशारा किया, जिन्होंने भी वही शिकायत की। उन्होंने राजा से कहा कि संपत्ति के इस अंतहीन झगड़े की वजह से गांववालों ने उन्हें गांव से निकाल दिया है। 

राजा हैरान होकर संत के पास लौटे और बोले, "धन्यवाद, आपने मुझे मृत्यु का महत्व समझाया।" 

संत ने कहा, "मृत्यु के कारण ही इस संसार में प्रेम है।" 

"मृत्यु के बारे में चिंता करने के बजाय, हर दिन और हर पल को खुशी से जियो। खुद को बदलो, दुनिया बदल जाएगी।" 

राजा शिबी का कबूतर की प्राण रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर का मांस काटकर देना



शीनर पुत्र महाराजा शिवि बड़े ही दयालु और शरणागतवत्सल थे। एक बार राजा एक महान यज्ञ कर रहे थे। इतने में एक कबूतर आता है और राजा की गोद में छिप जाता है। पीछे से एक विशाल बाज वहाँ आता है और राजा से कहता है –

राजन् मैने तो सुना था आप बड़े ही धर्मनिष्ठ राजा हैं फिर आज धर्म विरुद्ध आचरण क्य़ो कर रहे हैं। यह कबूतर मेरा आहार है और आप मुझसे मेरा आहार छीन रहे हैं।

इतने में कबूतर राजा से कहता है –

महाराज मैं इस बाज से डरकर आप की शरण में आया हूँ। मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए महाराज।

राजा धर्म संकट में पड़ जाते हैं। पर राजा अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके कहते हैं –

राजा – तुमसे डर कर यह कबूतर प्राण रक्षा के लिए मेरी शरण में आया हैं। इसलिए शरण में आये हुए इस कबूतर का मैं त्याग नहीं कर सकता। क्य़ोकि जो लोग शरणागत की रक्षा नहीं करते उनका कहीं भी कल्य़ाण नहीं होता।

बाज – राजन् प्रत्येक प्राणी भूख से व्याकुल होते हैं। मैं भी इस समय भूख से व्याकुल हूँ। यदि मुझे इस समय य़ह कबूतर नहीं मिला तो मेरे प्राण चले जायेंगे। मेरे प्राण जाने पर मेरे बाल-बच्चो के भी प्राण चले जाय़ेंगे। हे राजन्! इस तरह एक जीव के प्राण बचाने की जगह कई जीव के प्राण चले जाय़ेंगे।


राजा – शरण में आये इस कबूतर को तो मैं तुम्हें नहीं दे सकता। किसी और तरह तुम्हारी भूख शान्त हो सकती हो तो बताओ। मैं अपना पूरा राज्य़ तुम्हें दे सकता हूँ, पूरे राज्य़ का आहार तुम्हें दे सकता हूँ, अपना सब कुछ तुम्हें दे सकता हूँ पर य़ह कबूतर तुम्हें नही दे सकता।

बाज – हे राजन् । यदि आपका इस कबूतर पर इतना ही प्रेम है, तो इस कबूतर के ठीक बराबर का तौलकर आप अपना मांस मुझे दे दीजिए मैं अधिक नही चाहता।

राजा – तुमने बड़ी कृपा की। तुम जितना चाहो उतना मांस मैं देने को तैयार हूँ। यदि यह शरीर प्राणियों के उपकार के काम न आये तो प्रतिदिन इसका पालन पोषण करना बेकार है। हे बाज, मैं तुम्हारे कथनानुसार ही करता हूँ।

यह कहकर राजा ने एक तराजू मंगवाया और उसके एक पलडे में उस कबूतर को बैठाकर दूसरे में अपना मांस काट-काट कर रखने लगे और उस कबूतर के साथ तौलने लगे। कबूतर की रक्षा हो और बाज के भी प्राण बचें, दोनो का ही दुख निवारण हो इसलिए महाराज शिवि अपने हाथ से अपना मांस काट-काट के तराजू में रखने लगे।

तराजू में कबूतर का वजन मांस से बढता ही गया, राजा ने शरीर भर का मांस काट के रख दिया परन्तु कबूतर का पलडा नीचे ही रहा। तब राजा स्वयं तराजू पर चढ गये।

जैसे ही राजा तराजू पर चढे वैसे ही कबूतर और बाज दोनो ही अन्तर्धान हो गये और उनकी जगह इन्द्र और अग्नि देवता प्रगट हुए।

इन्द्र ने कहा- राजन् तुम्हारा कल्याण हो। और यह जो कबूतर बना था यह अग्नि है। हम लोग तुम्हारी परीक्षा लेने आये थे। तुमने जैसा दुस्कर कार्य किया है, वैसा आज तक किसी ने नहीं किया। जो मनुष्य अपने प्राणो को त्याग कर भी दूसरे के प्राणो की रक्षा करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है।

अपना पेट भरने के लिए तो पशु भी जीते हैं, पर प्रशंसा के योग्य जीवन तो उन लोगो का है जो दूसरों के लिए जीते हैं।

इन्द्र ने राजा को वरदान देते हुए कहा- तुम चिर काल तक दिव्य रूप धारण करके पृथ्वी का पालन कर अन्त में भगवान् के ब्रह्मलोक में जाओगे। इतना कहकर वे दोनो अन्तर्धान हो गये।

दोस्तों, भारत वह भूमि है जहाँ राजा शिवि और दधीचि जैसे लोग अवतरित हुए हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपना शरीर दान दे दिया।

चक्रवर्ती राजा दिलीप की गौ-भक्ति कथा

 शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ।


महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी। देवराज के बुलाने पर दिलीप एक बार स्वर्ग गये। देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देव असुर युद्ध हुआ। युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्ग में कामधेनु मिली, किंतु सम्राट दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं। कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया, न ही प्रदक्षिणा की।

इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया: मेरी संतान (नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा ।

महाराज दिलीप को शाप का कुछ पता नहीं था। किंतु उनके कोई पुत्र न होने से वे स्वयं, महारानी तथा प्रजा के लोग भी चिन्तित एवं दुखी रहते थे। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महाराज दिलीप रानी के साथ कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रमपर पहुंचे। महर्षि सब कुछ समझ गए। महर्षि ने कहा यह गौ माता के अपमान के पाप का फल है। सुरभि गौ की पुत्री नंदिनी गाय हमारे आश्रम पर विराजती है।

महर्षि ने आदेश दिया: कुछ काल आश्रम में रहो और मेरी कामधेनु नन्दिनी की सेवा करो।

महाराज ने गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली। महारानी सुदक्षिणा प्रात: काल उस गौ माता की भली-भाँति पूजा करती थी। आरती उतारकर नन्दिनी को पतिके संरक्षण-में वन में चरने के लिये विदा करती। सम्राट दिनभर छाया की भाँती उसका अनुगमन करते, उसके ठहरने पर ठहरते, चलनेपर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीनेपर जल पीते। संध्या काल में जब सम्राट के आगे-आगे सद्य:प्रसूता, बालवत्सा नन्दिनी आश्रम को लौटती तो महारानी देवी सुदक्षिणा हाथमें अक्षत-पात्र लेकर उसकी प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करतीं और अक्षतादिसे पुत्र प्राप्तिरूप अभीष्ट-सिद्धि देनेवाली उस नन्दिनी का विधिवत् पूजन करतीं।

अपने बछड़े को यथेच्छ पय:पान* कराने के बाद दुह ली जानेपर नन्दिनी की रात्रिमें दम्पति पुन: परिचर्या करते, अपने हाथों से कोमल हरित शष्प-कवल खिलाकर उसकी परितृप्ति करते और उसके विश्राम करने पर शयन करते । इस तरह उसकी परिचर्या करते इक्कीस दिन बीत गये। एक दिन वन में नन्दिनी का अनुराग करते महाराज दिलीप की दृष्टि क्षणभर अरण्य की प्राकृतिक सुंदरता में अटक गयी कि तभी उन्हें नन्दिनी का आर्तनाद सुनायी दिया।

वह एक भयानक सिंह के पंजों में फँसी छटपटा रही थी। उन्होंने आक्रामक सिंह को मारने के लिये अपने तरकश से तीर निकालना चाहा, किंतु उनका हाथ जडवत् निश्चेष्ट होकर वहीं अटक गया, वे चित्रलिखे से खड़े रह गये और भीतर ही भीतर छटपटाने लगे..

तभी मनुष्य की वाणी में सिंह बोल उठा: राजन्! तुम्हारे शस्त्र संधान का श्रम उसी तरह व्यर्थ है जैसे वृक्षों को उखाड़ देनेवाला प्रभंजन पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है। मैं भगवान् शिव के गण निकुम्भ का मित्र कुम्भोदर हूं ।

भगवान् शिव ने सिंहवृत्ति देकर मुझे हाथी आदि से इस वन के देवदारुओ की रक्षाका भार सौंपा है। इस समय जो भी जीव सर्वप्रथम मेरे दृष्टि पथ में आता है वह मेरा भक्ष्य बन जाता है। इस गाय ने इस संरक्षित वन मे प्रवेश करने की अनधिकार चेष्टा की है और मेरे भोजन की वेला मे यह मेरे सम्मुख आयी है, अत: मैं इसे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करूँगा। तुम लज्जा और ग्लानि छोड़कर वापस लौट जाओ।

किंतु परदु:खकातर दिलीप भय और व्यथा से छटपटाती, नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाती नन्दिनी को देखकर और उस संध्याकाल मे अपनी माँ की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करनेवा ले उसके दुधमुँहे बछड़े का स्मरण कर करुणा-विगलित हो

उठे! नन्दिनी का मातृत्व उन्हें अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान् जान पड़ा और उन्होंने सिंह से प्रार्थना की कि वह उनके शरीर को खाकर अपनी भूख मिटा हो और बालवत्सा नन्दिनी को छोड़ दे।

सिंह ने राजा के इस अदभुत प्रस्ताव का उपहास करते हुए कहा: राजन्! तुम चक्रवर्ती सम्राट हो। गुरु को नन्दिनी के बदले करोडों दुधार गौएँ देकर प्रसन्न कर सकते हो। अभी तुम युवा हो, इस तुच्छ प्राणीके लिये अपने स्वस्थ-सुन्दर शरीर और यौवन की अवहेलना कर जान की बाजी लगाने वाले स्रम्राट! लगता है, तुम अपना विवेक खो बैठे हो। यदि प्राणियों पर दया करने का तुम्हारा व्रत ही है तो भी आज यदि इस गाय के बादले मे मैं तुम्हें खा लूँगा तो तुम्हारे मर जानेपर केवल इसकी ही विपत्तियों से रक्षा हो सकेगी और यदि तुम जीवित रहे तो पिता की भाँती सम्पूर्ण प्रजा की निरन्तर विपत्तियों से रक्षा करते रहोगे ।

इसलिये तुम अपने सुख भोक्ता शरीर की रक्षा करो। स्वर्गप्राप्ति के लिये तप त्याग करके शरीर की कष्ट देना तुम जैसे अमित ऐश्वर्यशालियों के लिये निरर्थक है। स्वर्ग? अरे वह तो इसी पृथ्वीपर है। जिसे सांसारिक वैभव-विलास के समग्र साधन उपलब्ध हैं, वह समझो कि स्वर्ग में ही रह रहा है। स्वर्गका काल्पनिक आकर्षण तो मात्र विपन्नो के लिए ही है, सम्पन्नो के लिए नहीं। इस तरह से सिंह ने राजा को भ्रमित करने का प्रयत्न किया।

भगवान् शंकर के अनुचर सिंह की बात सुनकर अत्यंत दयालु महाराज दिलीप ने उसके द्वारा आक्रान्त नंदिनी को देखा जो अश्रुपूरित कातर नेत्रों से उनकी ओर देखती हुई प्राण रक्षा की याचना कर रही थी।

राजा ने क्षत्रियत्व के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उत्तर दिया: नहीं सिंह! नहीं, मैं गौ माता को तुम्हारा भक्ष्य बनाकर नहीं लौट सकता। मैं अपने क्षत्रियत्व को क्यों कलंकित करूं? क्षत्रिय संसार में इसलिये प्रसिद्ध हैं कि वे विपत्ति से औरों की रक्षा करते हैं। राज्य का भोग भी उनका लक्ष्य नहीं। उनका लक्ष्य तो है लोकरक्षासे कीर्ति अर्जित करना। निन्दा से मलिन प्राणों और राज्य को तो वे तुच्छ वस्तुओ की तरह त्याग देते हैं, इसलिये तुम मेरे यश: शरीर पर दयालु होओ।

मेरे भौतिक शरीर को खाकर उसकी रक्षा करो, क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है, मरणधर्मा है। इसलिये इसपर हम जैसे विचारशील पुरुषों की ममता नहीं होती। हम तो यश: शरीरके पोषक हैं। यह मांस का शरीर न भी रहे परंतु गौरक्षा से मेरा यशः शरीर सुरक्षित रहेगा। संसार यही कहेगा की गौ माता की रक्षा के लिए एक सूर्यवंश के राजा ने प्राण की आहुति दे दी। एक चक्रवर्ती सम्राट के प्राणों से भी अधिक मूल्यवान एक गाय है।

सिंह ने कहा: अगर आप अपना शारीर मेरा आहार बनाना ही चाहते है तो ठीक है। सिंह के स्वीकृति दे देने
पर राजर्षि दिलीप ने शास्त्रो को फेंक दिया और उसके आगे अपना शरीर मांसपिंड की तरह खाने के लिये डाल दिया और वे जाके सिर झुकाये आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे, तभी आकाश से विद्याधर उनपर पुष्पवृष्टि करने लगे।
उत्तिष्ठ वत्से त्यमृतायमानं वचः निशम्य॥

नन्दिनी ने कहा: हे पुत्र! उठो! यह मधुर दिव्य वाणी सुनकर राजा को महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने वात्सल्यमयी जननी की तरह अपने स्तनों से दूध बहाती हुई नन्दिनी गौ को देखा, किंतु सिंह दिखलायी नहीं दिया।

आश्चर्यचकित दिलीप से नन्दिनी ने कहा: हे सत्युरुष! तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये मैंने ही माया स्वसिंह की सृष्टि की थी।

महर्षि वसिष्ठ के प्रभावसे यमराज भी मुझपर प्रहार नहीं कर सकता तो अन्य सिंहक सिंहादिकी क्या शक्ति है। मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दयाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। वर माँगो! तुम मुझे दूध देने वाली मामूली गाय मत समझो, अपितु सम्पूर्ण कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु जानो।



राजा ने दोनों हाथ जोड़कर वंश चलाने वाले अनन्तकीर्ति पुत्र की याचना की नन्दिनीने तथास्तु कहा। उन्होंने कहा राजन् मै आपकी गौ भक्ति से अत्याधिक प्रसन्न हूँ, मेरे स्तनों से दूध निकल रहा है उसे पत्ते के दोने मे दुहकर पी लेनेकी आज्ञा गौ माता ने दी और कहा तुम्हे अत्यंत प्रतापी पुत्र की प्राप्ति होगी।

राजाने निवेदन किया: माँ! बछड़े के पीने तथा होमादि अनुष्ठान के बाद बचे हुए ही तुम्हारे दूध को मैं पी सकता हूँ। दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है और द्वितीय अधिकार गुरूजी का है।

भक्त्यागुरौ मय्यनुकम्पया च प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥

राजा के धैर्यने नंदिनी के हृदय को जीत लिया। वह प्रसन्नमना कामधेनु राजा के आगे-आगे आश्रम को लौट आयी। राजा ने बछड़े के पीने तथा अग्निहोत्र से बचे दूध का महर्षि की आज्ञा पाकर पान किया, फलत: वे रघु जैसे महान् यशस्वी पुत्र से पुत्रवान् हुए और इसी वंश में गौ-भक्ति के प्रताप से स्वयं भगवान् श्रीराम ने अवतार ग्रहण किया।

महाराज दिलीप की गौ-भक्ति तथा गौ-सेवा सभी के लिये एक महानतम आदर्श बन गयी। इसीलिये आज भी गौ-भक्तो के परिगणना मे महाराज दिलीप का नाम बड़े ही श्रद्धाभाव एवं आदर से सर्वप्रथम लिया जाता है। इस चरित्र से यह बात सिद्ध हो गयी की सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट से अधिक श्रेष्ठ एक गौ माता है ।

बृहदेश्वर शिव मंदिर तंजावुर तमिलनाडु

 

बृहदेश्वर शिव मंदिर,तंजावुर तमिलनाडु 

बृहदेश्वर मंदिर भारत के दक्षिणतम राज तमिलनाडु में स्थित एक प्राचीन और आश्चर्यचकित कर देने वाली हिंदू मंदिर हैं। इस मंदिर को इस तरह से बनाया गया है कि यह बिना नीव का ही खड़ा है। इस मंदिर का निर्माण के लिए तकरीबन 130000 टन से भी अधिक ग्रेनाइट का यूज़ किया गया था।

यहां पर एक बहुत बड़ी नंदी की प्रतिमा भी बनी हुई है। इसके अलावा यह वही मंदिर है जिसकी ऊपरी भाग पर बने गुटबंद की छाया जब सूरज अपने चरम पर होता है तब भी कभी धरती पर नहीं पड़ती है। 


बृहदेश्वर मंदिर का इतिहास – 

बृहदेश्वर मंदिर भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में स्थित एक पौराणिक एवं प्राचीन मंदिर हैं। यह बृहदेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित हिंदू धर्म से जुड़ी एक हिंदू धर्म का प्रमुख धार्मिक स्थल है।

यह बृहदेश्वर मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। इस बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल वंश के द्वारा करवाया गया था। चोल वंश के द्वारा इस विदेश्वर मंदिर का निर्माण 1010 ईस्वी के दौरान करवाया गया था। इस मंदिर में भगवान शिव की नृत्य की मुद्रा में स्थित मूर्ति है जिसे नटराज के नाम से जाना जाता है। इस बृहदेश्वर मंदिर को राजेश्वर मंदिर राजराजेश्वर और पेरिया कोविल के नाम से भी जाना जाता है।

यह मंदिर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्यों की वजह से काफी प्रमुख एवं प्रसिद्ध हैं जिसकी वजह से इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया गया है। इस मंदिर के निर्माण के लिए तकरीबन 130000 टन से भी अधिक ग्रेनाइट का उपयोग करते हुए इसे बनाया गया है।

इस बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल वंश के शासक महाराजा राजाराज प्रथम के द्वारा 1000 से 1009 ईस्वी के दौरान करवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण करने में तकरीबन 5 साल का समय लगा था, इन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम राजराजेश्वर मंदिर रखा गया था।

इस बृहदेश्वर मंदिर में नंदी बैल की बहुत बड़ी प्रतिमा को भी बनाया गया है जिसका वजन तकरीबन 20 टन बताया जाता है। आपको बता दें महाराज राजराज प्रथम भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे वह इस बृहदेश्वर मंदिर के अलावा भी कई शिव मंदिरों का निर्माण करवाया है।

बृहदेश्वर मंदिर की वास्तुकला – 

बृहदेश्वर मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य में तंजावुर में स्थित एक भारत की प्रमुख मंदिर हैं। इस मंदिर की वास्तुकला काफी खूबसूरत एवं आश्चर्यचकित कर देने वाली है। इस मंदिर को बनाने के लिए तकरीबन 130000 टन से भी अधिक ग्रेनाइट का उपयोग करते हुए इस मंदिर का निर्माण किया गया है, लेकिन इस मंदिर को बनाने के लिए ग्रेनाइट कहां से आया इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली।

इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण 216 फीट लंबा टावर हैं जो कि इस मंदिर के गर्भ गृह के ऊपर देखा जा सकता है। जब पर्यटक यहां पर आते हैं तो यह टावर काफी दूर से ही दिख जाता है। इसके अलावा यहां पर एक और प्रमुख चीज है वह है नंदी बैल की प्रतिमा जिसकी ऊंचाई तकरीबन 2 मीटर लंबी और 6 मीटर के साथ चौड़ाई में ढाई मीटर हैं यह प्रतिमा तकरीबन 20 टन वजन का है।

इसके अलावा इस मंदिर की सबसे आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि इस मंदिर की गुटबंद की छाया जब सूरज अपने चरम पर होता है तो तब भी कभी भी जमीन पर नहीं पड़ती है। इस रहस्य को जानने के लिए दुनिया भर से कई वास्तुकार और शिल्पकार भी आए। यह मंदिर वर्तमान समय में यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल हैं।

इस मंदिर से जुड़ी एक और बात बताई जाती है इस मंदिर के ऊपरी गुटबंद को तकरीबन 80 टन वजन के एक पत्थर से बनाया गया है। इस मंदिर से जुड़ी एक और आश्चर्यचकित करने वाली बात बताई जाती है कि यह बृहदेश्वर मंदिर बीना नीव का ही खड़ा है। यह कैसे संभव है इसके बारे में कोई कुछ नहीं बताता है।

बृहदेश्वर मंदिर का रहस्य –

तमिलनाडु राज्य में स्थित इस बृहदेश्वर मंदिर से जुड़ी कई आश्चर्यचकित कर देने वाले रहस्य हैं, यह जानने और देखने के लिए लोग भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के अलावा विदेशों से भी काफी अधिक संख्या में आया करते हैं। चलिए हम मंदिर से जुड़ी रहस्यों को एक एक कर विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं –

`बृहदेश्वर मंदिर के ऊपरी हिस्से पर बनी गुटबंद की छाया धरती पर नहीं पड़ती

बृहदेश्वर मंदिर पर इस तरह से बनाया गया है कि इस मंदिर के ऊपरी सिरे पर बना हुआ गुटबंद जिसकी छाया पृथ्वी पर नहीं पड़ती भले ही सूर्य का प्रकाश किसी भी दिशाओं से इस पर पड़े। दोपहर के समय में भी इस मंदिर के नीचे के कुछ हिस्से की परछाइयां जमीन पर दिखती है लेकिन इस मंदिर के ऊपरी हिस्से पर बने गुटबंद की परछाइयां कभी भी धरती पर नहीं बनती। इस घटना से जुड़ा रहस्य आज भी बना हुआ है। इस मंदिर के ऊपरी हिस्से पर 80 टन का ग्रेनाइट का बना हुआ गुटबंद जिसके ऊपर एक स्वर्ण कलश को भी स्थापित किया गया है।

बृहदेश्वर मंदिर बिना नीव के कैसे टिका हुआ है ?

इस बृजेश्वरी मंदिर के सबसे आश्चर्यजनक करने वाली खास बात यह है कि इस मंदिर को बनाने के लिए नीव को नहीं बनाया गया है। 

सबको आश्चर्यचकित करती है कि आखिर बिना नीव के यह 130000 टन ग्रेनाइट से बना मंदिर अखिर खड़ी कैसे हैं।

मंदिर के ऊपरी हिस्से पर बड़ा गुंबद

इस बृहदेश्वर मंदिर के ऊपरी हिस्से केवल एक ही काफी बड़ा लगभग 80 टन वजन का एक विशालकाय पत्थर से बना है। इसके बारे में आश्चर्य बता यह है कि जिस समय इस मंदिर का निर्माण हुआ था उस समय तो ना ही क्रेन जैसे कोई मशीन थी और नहीं और कुछ तो इतना बड़ा पत्थर को इस मंदिर के ऊपरी हिस्से पर रखा कैसे गया होगा।

बृहदेश्वर मंदिर का अद्भुत चित्रकारी और रंग

इस बृहदेश्वर मंदिर के दीवारों पर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियों को नकाशा गया है इसके अलावा इस मंदिर का शिखर ऐसा लगता है कि उससे किसी रंग से पोता गया है लेकिन वह किसी प्रकार का रंगा नहीं गया है वह एक पत्थर का वास्तविक रंग है। यह भी अपने आप में एक अनूठे चमत्कार से कम नहीं है।

मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक वाली सिस्टम –

इस बृहदेश्वर मंदिर को ग्रेनाइट के शिलाखंड द्वारा बनाया गया है लेकिन इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस शिलाखंड को आपस में जोड़ने के लिए किसी भी गूंध या चुना या सीमेंट से नहीं चिपकाया गया है बल्कि इन पत्थरों को आपस में इस तरह से फिक्स किया गया है कि यह मंदिर देखने से लगता है कि इसे किसी केमिकल से चिपकाया गया होगा।

वृद्धेश्वर मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य

  1. बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण तकरीबन 130000 ग्रेनाइट से किया गया है।
  2. इस बृहदेश्वर मंदिर को बनाने के लिए ग्रेनाइट कहां से लाया गया है इसके बारे में आज तक कोई जानकारी नहीं है।
  3. इस बृहदेश्वर मंदिर को चोल वंश के शासकों द्वारा बनवाया गया था।
  4. चोल वंश के शासकों द्वारा इस बृहदेश्वर मंदिर की तरह कई अन्य मंदिरों का निर्माण करवाया गया था।
  5. इस वृहदेश्वर मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल किया गया है।
  6. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर की गुंबद की छाया धरती पर नहीं पड़ती हैं।
  7. इस मंदिर के ऊपरी हिस्से के गोपुर के शीर्ष पर करीब 80 टन वजन का एक पत्थर रखा गया है जिसे कैप स्टोन कहा जाता है।
  8. इस वृहदेश्वर मंदिर के परिसर में नंदी बैल की एक विशालकाय प्रतिमा को भी स्थापित किया गया है, जो देखने में काफी ज्यादा अद्भुत और आकर्षक लगता है।


मार्शल अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना का पहला फाइव स्टार अधिकारी

 मार्शल अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना का पहला फाइव स्टार अधिकारी

 
अर्जन सिंह इंडियन एयरफोर्स के इकलौते ऐसे अफसर हैं, जिन्हें वर्ष 2002 में फाइव स्टार रैंक प्रदान किया गया. यह पद इंडियन आर्मी के फील्ड मार्शल पद के बराबर है. अपने एयरफोर्स की सेवा के दौरान अर्जन सिंह ने 60 अलग-अलग तरह के लड़ाकू विमान उड़ाये. इंडियन एयरफोर्स को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी व सशक्त एयरफोर्स बनाने में अर्जन सिंह की बेहद अहम भूमिका रही है.


19 वर्ष में पायलट ट्रेनिंग के लिए चुने गये


उनका जन्म 15 अप्रैल 1919 को लायलपुर (अब पाकिस्तान में फैसलाबाद) में हुआ था। सिर्फ 19 वर्ष की आयु में, उनका चयन आरएएफ कॉलेज, क्रैनवेल में ट्रेनिंग के लिए हुआ था। जिसके बाद दिसंबर 1939 वो रॉयल इंडियन एयर फोर्स में पायलट के तौर पर कमीशन हुए। अर्जन सिंह को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, महान कौशल और साहस के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से सम्मानित किया गया था।

आजादी के पहले जश्न में मिला अनूठा सम्मान


15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तब अर्जन सिंह को भारतीय वायुसेना के सौ से अधिक विमानों के फ्लाई-पास्ट का नेतृत्व करने का अनूठा सम्मान दिया गया। 44 वर्ष की आयु में अर्जन सिंह ने 01 अगस्त 1964 को एयर मार्शल की रैंक पर भारतीय वायुसेनाध्यक्ष का पद संभाला। विश्व में बहुत कम वायुसेनाध्यक्ष होंगे जिन्होंने 40 साल की उम्र में या पद संभाला होगा और 45 साल की उम्र में रिटायर हो गए हों।

वायुसेना से रिटायर होकर निभाईं कई जिम्मेदारियां


मार्शल अर्जन सिंह को रिटायरमेंट के बाद पहले स्विट्जरलैंड में भारत का राजदूत बनाया गया। जिसके बाद उन्हें कीनिया में भारत के उच्चायुक्त के तौर पर नियुक्त किया गया। वो अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भी रहे और दिल्ली के उप राज्यपाल की जिम्मेदारी भी संभाली। भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1965 की जंग के दौरान अर्जन सिंह को उनके नेतृत्व के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अर्जन सिंह भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल बने। जुलाई 1969 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना की बेहतरी और कल्याण के लिए अत्यधिक योगदान देना जारी रखा।

मार्शल अर्जन सिंह के जीवन की विशेष उप्लब्धियां


महज 20 साल की उम्र में रॉयल इंडियन एयर फोर्स को पायलट के तौर पर ज्वाइन किया
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से किए गए सम्मानित
महज 40 साल की उम्र में संभाला वायुसेनाध्यक्ष का पद
स्विट्जरलैंड में भारत के राजदूत के तौर पर भी निभाई जिम्मेदारी
1965 की जंग में कुशल नेतृत्व के लिए मिला पद्म विभूषण सम्मान
भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल
साल 2002 में वायु सेना के मार्शल के पद से किए गए सम्मानित
2002 में उन्हें वायु सेना के मार्शल के पद से सम्मानित किया
सम्मान में वायु सेना स्टेशन पानागढ़ का नाम बदलकर वायु सेना स्टेशन अर्जन सिंह किया गया
वायु सेना के पहले फाइव स्टार रैंक अधिकारी

भारतीय सेना में किन अधिकारियों को स्टार रैंकिंग दी जाती है


17 सितम्बर, 2017 को भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख और मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स के पद से सम्मानित अर्जन सिंह का निधन हो गया. 98 वर्षीय अर्जन सिंह मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स के पद से सम्मानित होने वाले पहले सैन्य अधिकारी थे. भारत में मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स का पद 5 स्टार रैंक वाला पद है और यह भारतीय वायु सेना का सर्वोच्च पद है. इस लेख में हम भारत की तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) के उन पदों का विवरण दे रहे हैं, जिस पद पर सुशोभित व्यक्ति को क्रमशः 5 स्टार, 4 स्टार, 3 स्टार, 2 स्टार एवं 1 स्टार रैंक से सम्मानित किया जाता है.

सेना में क्या होती है 5 स्टार रैंक, जानिए कौन होते हैं मार्शल और फील्ड मार्शल?

सैन्य परिवार में जन्मे अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के एकमात्र ऐसे अफसर थे, जिन्हें फाइव स्टार रैंक के साथ मार्शल (सेना में फील्ड मार्शल के बराबर) का ओहदा दिया गया था। तीनों सेनाओं में फाइव स्टार रैंक के अधिकारी कभी रिटायर नहीं होते। ये एक सम्मान का पद होता है।

भारतीय सेना के लिए मिसाल माने जाने वाले अर्जन सिंह ने 1965 में सबसे युवा वायु सेना प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय उनकी आयु महज 45 वर्ष थी। अर्जन सिंह के अंदर लड़ाकू पायलट का जज्बा आखिरी तक बरकरार रहा। 1969 में रिटायरमेंट तक वह सेना के 60 तरह के विमान उड़ा चुके थे।
इंडियन आर्मी में फील्ड मार्शल का पद एक सम्मान के तौर पर दिया जाता है। सेना का सबसे बड़ा पद जनरल ऑफ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ का होता है। आर्मी में अर्जन सिंह से पहले दो ही अफसरों को फील्ड मार्शल की रैंक दी गई थी। ये 5 स्टार रैंक फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ और फील्ड मार्शल एम करियप्पा को ही दिया गया है।

1971 में पाक के खिलाफ युद्ध के बाद जनरल सैम मानेक शॉ को 1973 में पहला फील्ड मार्शल बनाया गया। वहीं दूसरी ओर 1986 में जनरल के एम करियप्पा को दूसरा फील्ड मार्शल बनाया गया। आर्मी की तरह ही भारतीय वायुसेना में भी इसी तरह का एक सम्मान का पद मार्शल ऑफ एयरफोर्स बनाया गया। 2002 तक देश में कोई मार्शल ऑफ एयरफोर्स नहीं था।

2002 में मार्शल अर्जन सिंह को ये पहला सम्मान दिया गया। अब तक वायुसेना में सबसे बड़ा पद वायुसेनाध्यक्ष का था, जिसे एयर मार्शल कहा जाता है। एयर मार्शल के कंधे पर जहां 4 स्टार होते हैं वहीं मार्शल ऑफ एयरफोर्स के कंधे पर 5 स्टार लगाए जाते हैं। मार्शल अर्जन सिंह देश के पहले मार्शल ऑफ एयरफोर्स बनाए गए।

वायुसेना और आर्मी की तरह ही नौसेना में भी इसी तरह एक सम्मान का पद एडमिरल ऑफ फ्लीट बनाया गया। हालांकि अब तक भारतीय नौसेना में ये सम्मान किसी को नहीं दिया गया है।

वायुसेना में होती हैं ये 16 रैंक

वायुसेना में होती हैं ये 16 रैंक, सबसे बड़े होते हैं ये अधिकारी, यही कहलाते हैं इंडियन एयरफोर्स के प्रोफेशनल हेड
ये होते हैं इंडियन एयरफोर्स के कमीशन्ड ऑफिसर

रैंक : मार्शल ऑफ द एयरफोर्स


- मार्शल ऑफ द एयरफोर्स इंडियन एयरफोर्स की हाइएस्ट रैंक है। यह युद्ध के दौरान मिलने वाली एक पदवी है। यह फाइव-स्टार रैंक है। कई देशों में इस तरह की रैंक है लेकिन सभी इसका यूज नहीं करते। मार्शल ऑफ द एयरफोर्स अर्जन सिंह, आईएएफ में एकमात्र मार्शल ऑफ द एयरफोर्स रहे हैं।

रैंक : एयर चीफ मार्शल


- यह इंडियन एयरफोर्स की दूसरी सबसे बड़ी रैंक है। यह फोर स्टार रैंक होती है। सिर्फ एयर चीफ मार्शल ही चीफ ऑफ द एयर स्टाफ (CAS) की पोजिशन लेते हैं। यह इंडियन एयरफोर्स के प्रोफेशनल हेड और कमांडर होते हैं। 

रैंक : एयर मार्शल


- इंडियन एयरफोर्स में यह तीसरी रैंक होती है। इस पर काफी सीनियर अधिकारी काबिज होते हैं।

रैंक : एयर वाइस मार्शल


- यह टू स्टार रैंक होती है।

रैंक : एयर कॉमडोर


- यह स्टार कैटेगरी की सबसे जूनियर रैंक है। यह एक सिंगल स्टार रैंक होती है।

रैंक : ग्रुप कैप्टन


- यह सीनियर कमीशन्ड रैंक होती है। यह रैंक आर्मी के कर्नल के बराबर होती है।

रैंक : विंग कमांडर


- ग्रुप कैप्टर के बाद दूसरे नंबर की रैंक विंग कमांडर की होती है। हालांकि ये भी सीनियर कमीशन्ड रैंक कहलाती है।

रैंक : स्क्वॉड्रन लीडर


- विंग कमांडर के बाद स्क्वॉड्रन लीडर होते हैं।


रैंक : फ्लाइट लेफ्टिनेंट


- यह भी कमीशन्ड एयर ऑफिसर की रैंक होती है, जो स्क्वॉड्रन लीडर के बाद आते हैं। इन्हें कभी भी सिर्फ लेफ्टिनेंट नहीं कहा जाता।

रैंक : फ्लाइंग ऑफिसर


- यह भी कमीशन्ड रैंक है। इसे एयरक्राफ्ट को उड़ाने वाले ऑफिसर्स के साथ ही ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर और एयर क्रू ऑफिसर्स भी होल्ड कर सकते हैं।

जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर कौन होते हैं...


रैंक : मास्टर वारंट ऑफिसर


- जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर में यह हाइएस्ट रैंक होती है।

रैंक : वारंट ऑफिसर


- यह जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर में दूसरी सबसे बड़ी रैंक है।

रैंक : जूनियर वारंट ऑफिसर


- यह अधिकतर टेक्निकल लीडर होते हैं।

नॉन कमीशन्ड ऑफिसर्स कौन होते हैं


रैंक : सार्जेंट


- जूनियर वारंट ऑफिसर के बाद सार्जेंट की रैंक आती है।

रैंक : कॉर्परल


- यह मिलिट्री रैंक है, जो सैनिकों के समूह को देखते हैं।

रैंक : लीडिंग एयरक्राफ्टमैन


- टेक्निकल यह कोई रैंक नहीं है लेकिन यह एक टाइटल है।

रैंक : एयरक्राफ्ट मैन


- यह इंडियन एयरफोर्स की सबसे निचली रैंक है।



KM Cariappa: आजाद भारत के पहले फील्ड मार्शल थे केएम करियप्पा, पाक जनरल भी करते थे सम्मान

 

भारत के पहले फील्ड मार्शल थे केएम करियप्पा

KM Cariappa Ka Jivan Parichay: स्वतंत्र भारत में जब भारतीय सेना के नेतृत्व की बात आती है तब के.एम.करियप्पा का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वह भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ थे जिन्होंने भारत के अंतिम ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ ‘जनरल फ्रांसिस बुचर’ (General Francis Bucher) के स्थान पर 15 जनवरी, 1949 को कमांडर इन चीफ का पदभार ग्रहण किया था। वहीं भारतीय सेना के पहले सेनाध्यक्ष बनने के उपलक्ष्य पर हर वर्ष फील्ड मार्शल केएम करियप्पा की याद में ‘भारतीय सेना दिवस’ मनाया जाता है। 

क्या आप जानते हैं केएम करियप्पा प्रथम सेनाध्यक्ष होने के साथ ही भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के ऑफिसर थे। इसके अलावा ‘लेह’ को भारत का हिस्सा बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। आपको बता दें केएम करियप्पा की सेवाओं के लिए उन्हें 86 वर्ष की आयु में 15 जनवरी 1986 को फील्ड मार्शल की पदवी से सम्मानित किया गया था। इस वर्ष फील्ड मार्शल केएम करियप्पा की 125वीं जयंती मनाई जा रही है। आइए अब हम भारत के प्रथम फील्ड मार्शल केएम करियप्पा का जीवन परिचय (KM Cariappa Ka Jivan Parichay) और उनकी उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानते हैं। 



नाम कोडांदेरा मदप्पा करियप्पा (K.M. Cariappa) 
जन्म 28 जनवरी, 1899 
जन्म स्थान कुर्ग, कर्नाटक 
शिक्षा प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास 
पद प्रथम कमांडर-इन-चीफ 
पुरस्कार एवं सम्मान “ऑर्डर ऑफ द चीफ कमांडर ऑफ द लीजन ऑफ मेरिट” व “ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर” 
निधन 15 मई, 1993 बेंगलुरु, कर्नाटक 

Army Day 2025: कौन थे फील्ड मार्शल करियप्पा? जिनसे जुड़ी हैं आर्मी डे की यादें, 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ था?

केएम करियप्पा आजाद भारत के पहले फील्ड मार्शल थे, जिन्हें 15 जनवरी 1949 को सेना का प्रमुख बनाया गया था। पहले सेना प्रमुख होने के साथ-साथ वह भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के अधिकारी थे। भारतीय सेना में तीस साल रहकर उन्होंने देश की सेवा की और साल 1953 में रिटायर हो गए। हालांकि, रिटायर होने के बाद भी फील्ड मार्शल करियप्पा भारतीय सेना में किसी न किसी रूप में अपना योगदान देते रहे। 94 साल की उम्र में 15 मई 1993 को बेंगलुरू में करियप्पा का निधन हो गया।

सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर हुई थी पहली तैयारी

कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा ने अपनी नौकरी की शुरुआत भारतीय-ब्रिटिश फौज की राजपूत रेजीमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति के साथ की थी। केएम करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा माडिकेरी सेंट्रल हाई स्कूल से हुई थी। हालांकि, उन्होंने अपनी पढ़ाई मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरी की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह इंदौर स्थित आर्मी ट्रेनिंग स्कूल के लिए सेलेक्ट हो गए। आर्मी ट्रेनिंग स्कूल से ट्रेनिंग पूरा होने के बाद साल 1919 में उन्हें सेना में कमीशन मिला और भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर उनकी तैनाती कर दी गई।  

सेना दिवस और करियप्पा का यह है खास कनेक्शन

फील्ड मार्शल करियप्पा को 15 जनवरी 1949 को भारत का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी दिन भारतीय अधिकारी को कमांडर इन चीफ का पद मिला था। इससे पहले इस पद पर अंग्रेजों की नियुक्ति होती थी। 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश शासन ने पहली बार भारतीय सेना को कमान सौंपी थी और इस दौरान करियप्पा सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने जनरल सर फ्रांसिस बुचर का स्थान लिया और भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार ग्रहण किया। इसी दिन भारत में हर साल जवानों और भारतीय सेना की याद में सेना दिवस (Army Day) मनाया जाता है।

1986 में दिया गया फील्ड मार्शल का पद

केएम करियप्पा साल 1953 में सेना से रिटायर हो गए, जिसके बाद उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में राजदूत बनाया गया। करियप्पा ने अपने अनुभव के कारण कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी मदद की। भारत सरकार ने सन 1986 में उन्हें "फील्ड मार्शल" का पद दिया। सेवानिवृत्ति के बाद केएम करियप्पा कर्नाटक के कोडागू जिले के मदिकेरी में बस गए थे। करिअप्पा को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, मेन्शंड इन डिस्पैचेस और लीजियन ऑफ मेरिट जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया था।

भारत के प्रथम कमांडर-इन-चीफ

भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय जब पूरे देश में हिंसा व उथल-पुथल का माहौल था। वहीं देश के हजारों-लाखों शरणार्थियों को एक देश से दूसरे देश में आवागमन करना था। उस दौरान भी भारत के कई स्थानों पर बड़े राष्ट्रीय आंदोलन हो रहे थे, जिसके कारण दोनों देशों की ही सरकार व अवाम को कई प्रशासनिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। 


वहीं इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए एक व्यवस्थित सेना की आवश्यकता थी। किंतु भारत की आजादी के बाद के कुछ वर्षों में भी भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश मूल के अधिकारियों के हाथ में ही हुआ करती थी। वर्ष 1947 में भारत को पूर्ण स्वराज मिलने के बाद भी भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश भारत के अंतिम कमांडर-इन-चीफ ‘जनरल फ्रांसिस बुचर’ (General Francis Bucher) के हाथों में ही थी। 


किंतु 15, जनवरी 1949 को के एम करिअप्पा पहले ऐसे अधिकारी बने जिन्होंने स्वतंत्र भारत में लेफ्टिनेंट जनरल का पदभार संभाला था। यह दिन ना केवल भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण होता है बल्कि भारतीय इतिहास के स्वर्णिम दिनों में भी अहम माना जाता है। 


लेह को भारत का हिस्सा बनाने में निभाई अहम भूमिका 

करिअप्पा ने वर्ष 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। बता दें कि लेह को भारत का हिस्सा बनाने में करिअप्पा की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वहीं भारत-पाकिस्तान के विस्थापन के वक्त उन्हें ही दोनों देशों की सेनाओं के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। करिअप्पा के नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को कारगिल व अन्य स्थानों पर करारी शिकस्त दी थी। 

सेवानिवृत होने के बाद रहे हाई कमिश्नर 

केएम करियप्पा 30 वर्षों तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद वर्ष 1953 में सेवानिवृत हुए। किंतु रिटायर होने के बाद भी अपनी सेवाएं जारी रही। वह कुछ वर्ष तक ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। वहीं, वर्ष 1993 में 94 वर्ष की आयु में अपने गृह स्थान बेंगलुरु में वह पंचतत्व में विलीन हो गए।


पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान के बॉस थे करियप्पा

फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा बंटवारे से पहले पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के भी बॉस रह चुके थे। अयूब खान सेना में रहते हुए जनरल करियप्पा के साथ काम किया था। साल 1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जनरल करियप्पा सेना से रिटायर हो चुके थे। हालांकि, उनके बेटे केसी नंदा करियप्पा इसी दौरान एयरफोर्स में सेवा देते हुए पाकिस्तानी सेना पर कहर बरपा रहे थे। पाकिस्तानी सेना पर गोले बरसाते हुए वह गलती से दुश्मन देश की सीमा में प्रवेश कर गए और उनका विमान पाकिस्तानी सेना की गोलियों का शिकार हो गया।

सभी भारतीय जवान मेरे बेटे के सामान

दुश्मन की सीमा में किसी भी तरह सुरक्षित नीचे उतरने के बाद  पाकिस्तानी सेना ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि, पाकिस्तानी सेना को जब पता चला कि केसी नंदा रिटायर्ड जनरल केएम करियप्पा के बेटे हैं तो पाक सेना में खलबली मच गई। इसकी जानकारी जब उस समय के पाक राष्ट्रपति अयूब खान को दी गई तो उन्होंने पाक उच्चायुक्त को पूर्व सेना प्रमुख करियप्पा से बात करने के लिए कहा। पाक उच्चायुक्त ने पूर्व सेना प्रमुख करियप्पा से बात की और उनके बेटे को छोड़ने की पेशकश की, जिसमें करियप्पा ने कहा कि पाकिस्तान में बंद सभी भारतीय जवान मेरे बेटे हैं और छोड़ना है तो सबको छोड़ो। हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।  

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