मार्शल अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना का पहला फाइव स्टार अधिकारी
अर्जन सिंह इंडियन एयरफोर्स के इकलौते ऐसे अफसर हैं, जिन्हें वर्ष 2002 में फाइव स्टार रैंक प्रदान किया गया. यह पद इंडियन आर्मी के फील्ड मार्शल पद के बराबर है. अपने एयरफोर्स की सेवा के दौरान अर्जन सिंह ने 60 अलग-अलग तरह के लड़ाकू विमान उड़ाये. इंडियन एयरफोर्स को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी व सशक्त एयरफोर्स बनाने में अर्जन सिंह की बेहद अहम भूमिका रही है.
उनका जन्म 15 अप्रैल 1919 को लायलपुर (अब पाकिस्तान में फैसलाबाद) में हुआ था। सिर्फ 19 वर्ष की आयु में, उनका चयन आरएएफ कॉलेज, क्रैनवेल में ट्रेनिंग के लिए हुआ था। जिसके बाद दिसंबर 1939 वो रॉयल इंडियन एयर फोर्स में पायलट के तौर पर कमीशन हुए। अर्जन सिंह को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, महान कौशल और साहस के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से सम्मानित किया गया था।
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तब अर्जन सिंह को भारतीय वायुसेना के सौ से अधिक विमानों के फ्लाई-पास्ट का नेतृत्व करने का अनूठा सम्मान दिया गया। 44 वर्ष की आयु में अर्जन सिंह ने 01 अगस्त 1964 को एयर मार्शल की रैंक पर भारतीय वायुसेनाध्यक्ष का पद संभाला। विश्व में बहुत कम वायुसेनाध्यक्ष होंगे जिन्होंने 40 साल की उम्र में या पद संभाला होगा और 45 साल की उम्र में रिटायर हो गए हों।
मार्शल अर्जन सिंह को रिटायरमेंट के बाद पहले स्विट्जरलैंड में भारत का राजदूत बनाया गया। जिसके बाद उन्हें कीनिया में भारत के उच्चायुक्त के तौर पर नियुक्त किया गया। वो अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भी रहे और दिल्ली के उप राज्यपाल की जिम्मेदारी भी संभाली। भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1965 की जंग के दौरान अर्जन सिंह को उनके नेतृत्व के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अर्जन सिंह भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल बने। जुलाई 1969 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना की बेहतरी और कल्याण के लिए अत्यधिक योगदान देना जारी रखा।
महज 20 साल की उम्र में रॉयल इंडियन एयर फोर्स को पायलट के तौर पर ज्वाइन किया
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से किए गए सम्मानित
महज 40 साल की उम्र में संभाला वायुसेनाध्यक्ष का पद
स्विट्जरलैंड में भारत के राजदूत के तौर पर भी निभाई जिम्मेदारी
1965 की जंग में कुशल नेतृत्व के लिए मिला पद्म विभूषण सम्मान
भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल
साल 2002 में वायु सेना के मार्शल के पद से किए गए सम्मानित
2002 में उन्हें वायु सेना के मार्शल के पद से सम्मानित किया
सम्मान में वायु सेना स्टेशन पानागढ़ का नाम बदलकर वायु सेना स्टेशन अर्जन सिंह किया गया
वायु सेना के पहले फाइव स्टार रैंक अधिकारी
17 सितम्बर, 2017 को भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख और मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स के पद से सम्मानित अर्जन सिंह का निधन हो गया. 98 वर्षीय अर्जन सिंह मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स के पद से सम्मानित होने वाले पहले सैन्य अधिकारी थे. भारत में मार्शल ऑफ इंडियन एयर फोर्स का पद 5 स्टार रैंक वाला पद है और यह भारतीय वायु सेना का सर्वोच्च पद है. इस लेख में हम भारत की तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) के उन पदों का विवरण दे रहे हैं, जिस पद पर सुशोभित व्यक्ति को क्रमशः 5 स्टार, 4 स्टार, 3 स्टार, 2 स्टार एवं 1 स्टार रैंक से सम्मानित किया जाता है.
सैन्य परिवार में जन्मे अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के एकमात्र ऐसे अफसर थे, जिन्हें फाइव स्टार रैंक के साथ मार्शल (सेना में फील्ड मार्शल के बराबर) का ओहदा दिया गया था। तीनों सेनाओं में फाइव स्टार रैंक के अधिकारी कभी रिटायर नहीं होते। ये एक सम्मान का पद होता है।
भारतीय सेना के लिए मिसाल माने जाने वाले अर्जन सिंह ने 1965 में सबसे युवा वायु सेना प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय उनकी आयु महज 45 वर्ष थी। अर्जन सिंह के अंदर लड़ाकू पायलट का जज्बा आखिरी तक बरकरार रहा। 1969 में रिटायरमेंट तक वह सेना के 60 तरह के विमान उड़ा चुके थे।
इंडियन आर्मी में फील्ड मार्शल का पद एक सम्मान के तौर पर दिया जाता है। सेना का सबसे बड़ा पद जनरल ऑफ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ का होता है। आर्मी में अर्जन सिंह से पहले दो ही अफसरों को फील्ड मार्शल की रैंक दी गई थी। ये 5 स्टार रैंक फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ और फील्ड मार्शल एम करियप्पा को ही दिया गया है।
1971 में पाक के खिलाफ युद्ध के बाद जनरल सैम मानेक शॉ को 1973 में पहला फील्ड मार्शल बनाया गया। वहीं दूसरी ओर 1986 में जनरल के एम करियप्पा को दूसरा फील्ड मार्शल बनाया गया। आर्मी की तरह ही भारतीय वायुसेना में भी इसी तरह का एक सम्मान का पद मार्शल ऑफ एयरफोर्स बनाया गया। 2002 तक देश में कोई मार्शल ऑफ एयरफोर्स नहीं था।
2002 में मार्शल अर्जन सिंह को ये पहला सम्मान दिया गया। अब तक वायुसेना में सबसे बड़ा पद वायुसेनाध्यक्ष का था, जिसे एयर मार्शल कहा जाता है। एयर मार्शल के कंधे पर जहां 4 स्टार होते हैं वहीं मार्शल ऑफ एयरफोर्स के कंधे पर 5 स्टार लगाए जाते हैं। मार्शल अर्जन सिंह देश के पहले मार्शल ऑफ एयरफोर्स बनाए गए।
वायुसेना और आर्मी की तरह ही नौसेना में भी इसी तरह एक सम्मान का पद एडमिरल ऑफ फ्लीट बनाया गया। हालांकि अब तक भारतीय नौसेना में ये सम्मान किसी को नहीं दिया गया है।
वायुसेना में होती हैं ये 16 रैंक, सबसे बड़े होते हैं ये अधिकारी, यही कहलाते हैं इंडियन एयरफोर्स के प्रोफेशनल हेड
ये होते हैं इंडियन एयरफोर्स के कमीशन्ड ऑफिसर
- मार्शल ऑफ द एयरफोर्स इंडियन एयरफोर्स की हाइएस्ट रैंक है। यह युद्ध के दौरान मिलने वाली एक पदवी है। यह फाइव-स्टार रैंक है। कई देशों में इस तरह की रैंक है लेकिन सभी इसका यूज नहीं करते। मार्शल ऑफ द एयरफोर्स अर्जन सिंह, आईएएफ में एकमात्र मार्शल ऑफ द एयरफोर्स रहे हैं।
- यह इंडियन एयरफोर्स की दूसरी सबसे बड़ी रैंक है। यह फोर स्टार रैंक होती है। सिर्फ एयर चीफ मार्शल ही चीफ ऑफ द एयर स्टाफ (CAS) की पोजिशन लेते हैं। यह इंडियन एयरफोर्स के प्रोफेशनल हेड और कमांडर होते हैं।
- इंडियन एयरफोर्स में यह तीसरी रैंक होती है। इस पर काफी सीनियर अधिकारी काबिज होते हैं।
- यह टू स्टार रैंक होती है।
- यह स्टार कैटेगरी की सबसे जूनियर रैंक है। यह एक सिंगल स्टार रैंक होती है।
- यह सीनियर कमीशन्ड रैंक होती है। यह रैंक आर्मी के कर्नल के बराबर होती है।
- ग्रुप कैप्टर के बाद दूसरे नंबर की रैंक विंग कमांडर की होती है। हालांकि ये भी सीनियर कमीशन्ड रैंक कहलाती है।
- विंग कमांडर के बाद स्क्वॉड्रन लीडर होते हैं।
- यह भी कमीशन्ड एयर ऑफिसर की रैंक होती है, जो स्क्वॉड्रन लीडर के बाद आते हैं। इन्हें कभी भी सिर्फ लेफ्टिनेंट नहीं कहा जाता।
- यह भी कमीशन्ड रैंक है। इसे एयरक्राफ्ट को उड़ाने वाले ऑफिसर्स के साथ ही ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर और एयर क्रू ऑफिसर्स भी होल्ड कर सकते हैं।
- जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर में यह हाइएस्ट रैंक होती है।
- यह जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर में दूसरी सबसे बड़ी रैंक है।
- यह अधिकतर टेक्निकल लीडर होते हैं।
- जूनियर वारंट ऑफिसर के बाद सार्जेंट की रैंक आती है।
- यह मिलिट्री रैंक है, जो सैनिकों के समूह को देखते हैं।
- टेक्निकल यह कोई रैंक नहीं है लेकिन यह एक टाइटल है।
- यह इंडियन एयरफोर्स की सबसे निचली रैंक है।
KM Cariappa: आजाद भारत के पहले फील्ड मार्शल थे केएम करियप्पा, पाक जनरल भी करते थे सम्मान
भारत के पहले फील्ड मार्शल थे केएम करियप्पा
KM Cariappa Ka Jivan Parichay: स्वतंत्र भारत में जब भारतीय सेना के नेतृत्व की बात आती है तब के.एम.करियप्पा का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वह भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ थे जिन्होंने भारत के अंतिम ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ ‘जनरल फ्रांसिस बुचर’ (General Francis Bucher) के स्थान पर 15 जनवरी, 1949 को कमांडर इन चीफ का पदभार ग्रहण किया था। वहीं भारतीय सेना के पहले सेनाध्यक्ष बनने के उपलक्ष्य पर हर वर्ष फील्ड मार्शल केएम करियप्पा की याद में ‘भारतीय सेना दिवस’ मनाया जाता है।
क्या आप जानते हैं केएम करियप्पा प्रथम सेनाध्यक्ष होने के साथ ही भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के ऑफिसर थे। इसके अलावा ‘लेह’ को भारत का हिस्सा बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। आपको बता दें केएम करियप्पा की सेवाओं के लिए उन्हें 86 वर्ष की आयु में 15 जनवरी 1986 को फील्ड मार्शल की पदवी से सम्मानित किया गया था। इस वर्ष फील्ड मार्शल केएम करियप्पा की 125वीं जयंती मनाई जा रही है। आइए अब हम भारत के प्रथम फील्ड मार्शल केएम करियप्पा का जीवन परिचय (KM Cariappa Ka Jivan Parichay) और उनकी उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।
| नाम | कोडांदेरा मदप्पा करियप्पा (K.M. Cariappa) |
| जन्म | 28 जनवरी, 1899 |
| जन्म स्थान | कुर्ग, कर्नाटक |
| शिक्षा | प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास |
| पद | प्रथम कमांडर-इन-चीफ |
| पुरस्कार एवं सम्मान | “ऑर्डर ऑफ द चीफ कमांडर ऑफ द लीजन ऑफ मेरिट” व “ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर” |
| निधन | 15 मई, 1993 बेंगलुरु, कर्नाटक |
Army Day 2025: कौन थे फील्ड मार्शल करियप्पा? जिनसे जुड़ी हैं आर्मी डे की यादें, 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ था?
केएम करियप्पा आजाद भारत के पहले फील्ड मार्शल थे, जिन्हें 15 जनवरी 1949 को सेना का प्रमुख बनाया गया था। पहले सेना प्रमुख होने के साथ-साथ वह भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के अधिकारी थे। भारतीय सेना में तीस साल रहकर उन्होंने देश की सेवा की और साल 1953 में रिटायर हो गए। हालांकि, रिटायर होने के बाद भी फील्ड मार्शल करियप्पा भारतीय सेना में किसी न किसी रूप में अपना योगदान देते रहे। 94 साल की उम्र में 15 मई 1993 को बेंगलुरू में करियप्पा का निधन हो गया।
सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर हुई थी पहली तैयारी
कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा ने अपनी नौकरी की शुरुआत भारतीय-ब्रिटिश फौज की राजपूत रेजीमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति के साथ की थी। केएम करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा माडिकेरी सेंट्रल हाई स्कूल से हुई थी। हालांकि, उन्होंने अपनी पढ़ाई मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरी की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह इंदौर स्थित आर्मी ट्रेनिंग स्कूल के लिए सेलेक्ट हो गए। आर्मी ट्रेनिंग स्कूल से ट्रेनिंग पूरा होने के बाद साल 1919 में उन्हें सेना में कमीशन मिला और भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर उनकी तैनाती कर दी गई।
सेना दिवस और करियप्पा का यह है खास कनेक्शन
फील्ड मार्शल करियप्पा को 15 जनवरी 1949 को भारत का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी दिन भारतीय अधिकारी को कमांडर इन चीफ का पद मिला था। इससे पहले इस पद पर अंग्रेजों की नियुक्ति होती थी। 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश शासन ने पहली बार भारतीय सेना को कमान सौंपी थी और इस दौरान करियप्पा सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने जनरल सर फ्रांसिस बुचर का स्थान लिया और भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार ग्रहण किया। इसी दिन भारत में हर साल जवानों और भारतीय सेना की याद में सेना दिवस (Army Day) मनाया जाता है।
1986 में दिया गया फील्ड मार्शल का पद
केएम करियप्पा साल 1953 में सेना से रिटायर हो गए, जिसके बाद उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में राजदूत बनाया गया। करियप्पा ने अपने अनुभव के कारण कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी मदद की। भारत सरकार ने सन 1986 में उन्हें "फील्ड मार्शल" का पद दिया। सेवानिवृत्ति के बाद केएम करियप्पा कर्नाटक के कोडागू जिले के मदिकेरी में बस गए थे। करिअप्पा को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, मेन्शंड इन डिस्पैचेस और लीजियन ऑफ मेरिट जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया था।
भारत के प्रथम कमांडर-इन-चीफ
भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय जब पूरे देश में हिंसा व उथल-पुथल का माहौल था। वहीं देश के हजारों-लाखों शरणार्थियों को एक देश से दूसरे देश में आवागमन करना था। उस दौरान भी भारत के कई स्थानों पर बड़े राष्ट्रीय आंदोलन हो रहे थे, जिसके कारण दोनों देशों की ही सरकार व अवाम को कई प्रशासनिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था।
वहीं इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए एक व्यवस्थित सेना की आवश्यकता थी। किंतु भारत की आजादी के बाद के कुछ वर्षों में भी भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश मूल के अधिकारियों के हाथ में ही हुआ करती थी। वर्ष 1947 में भारत को पूर्ण स्वराज मिलने के बाद भी भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश भारत के अंतिम कमांडर-इन-चीफ ‘जनरल फ्रांसिस बुचर’ (General Francis Bucher) के हाथों में ही थी।
किंतु 15, जनवरी 1949 को के एम करिअप्पा पहले ऐसे अधिकारी बने जिन्होंने स्वतंत्र भारत में लेफ्टिनेंट जनरल का पदभार संभाला था। यह दिन ना केवल भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण होता है बल्कि भारतीय इतिहास के स्वर्णिम दिनों में भी अहम माना जाता है।
लेह को भारत का हिस्सा बनाने में निभाई अहम भूमिका
करिअप्पा ने वर्ष 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। बता दें कि लेह को भारत का हिस्सा बनाने में करिअप्पा की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वहीं भारत-पाकिस्तान के विस्थापन के वक्त उन्हें ही दोनों देशों की सेनाओं के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। करिअप्पा के नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को कारगिल व अन्य स्थानों पर करारी शिकस्त दी थी।
सेवानिवृत होने के बाद रहे हाई कमिश्नर
केएम करियप्पा 30 वर्षों तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद वर्ष 1953 में सेवानिवृत हुए। किंतु रिटायर होने के बाद भी अपनी सेवाएं जारी रही। वह कुछ वर्ष तक ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। वहीं, वर्ष 1993 में 94 वर्ष की आयु में अपने गृह स्थान बेंगलुरु में वह पंचतत्व में विलीन हो गए।
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान के बॉस थे करियप्पा
फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा बंटवारे से पहले पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के भी बॉस रह चुके थे। अयूब खान सेना में रहते हुए जनरल करियप्पा के साथ काम किया था। साल 1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जनरल करियप्पा सेना से रिटायर हो चुके थे। हालांकि, उनके बेटे केसी नंदा करियप्पा इसी दौरान एयरफोर्स में सेवा देते हुए पाकिस्तानी सेना पर कहर बरपा रहे थे। पाकिस्तानी सेना पर गोले बरसाते हुए वह गलती से दुश्मन देश की सीमा में प्रवेश कर गए और उनका विमान पाकिस्तानी सेना की गोलियों का शिकार हो गया।
सभी भारतीय जवान मेरे बेटे के सामान
दुश्मन की सीमा में किसी भी तरह सुरक्षित नीचे उतरने के बाद पाकिस्तानी सेना ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि, पाकिस्तानी सेना को जब पता चला कि केसी नंदा रिटायर्ड जनरल केएम करियप्पा के बेटे हैं तो पाक सेना में खलबली मच गई। इसकी जानकारी जब उस समय के पाक राष्ट्रपति अयूब खान को दी गई तो उन्होंने पाक उच्चायुक्त को पूर्व सेना प्रमुख करियप्पा से बात करने के लिए कहा। पाक उच्चायुक्त ने पूर्व सेना प्रमुख करियप्पा से बात की और उनके बेटे को छोड़ने की पेशकश की, जिसमें करियप्पा ने कहा कि पाकिस्तान में बंद सभी भारतीय जवान मेरे बेटे हैं और छोड़ना है तो सबको छोड़ो। हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।
श्री राम के पुत्र लव द्वारा बसाया गया शहर लाहौर
लाहौर मे 1938 मे इस गली मे हवेलीया बनवाने वाले हिन्दूओ को क्या पता था कि 9 वर्ष बाद ही 1947 यहां से सब कुछ छोडकर भागना पडेगा..?? लाहौर एक दास्तां है जो हिन्दुओ को यह बताती है कि पैसा कमा लेना सबकुछ नही है।
श्री राम के पुत्र लव द्वारा बसाया गया शहर लाहौर। महाराज रणजीत सिंह के समय लाहौर में वाराणसी से ज्यादा मंदिर और गुरुद्वारे थे। बंटवारे तक व्यापार में अग्रवालों, जाटो और सिखों का डंका बजता था।
मगर इन मूर्खो ने सदैव छद्म धर्मनिरपेक्षता बनाये रखी, लाहौर में म्लेच्छ मुसलमानो को अपने यहाँ काम पर रखते गए। उन्ही म्लेच्छ मुसलमानो ने बहुसंख्यक होकर अग्रवालों और सिखों को घसीट घसीट कर मारा। ऊंची ऊंची शेखावटी हवेलियां और सरदारों के महल जेहादियो ने कब्जा लिए।
भारत में लाहौर पेशावर मुल्तान ढाका गुजरांवाला मीरपुरखास में बड़ी-बड़ी हवेलिया और बड़ी-बड़ी कोठियां रखने वाले हिंदुओं और सिखों को भी रातों-रात अपना सब कुछ छोड़ कर भागना पड़ा था। हिन्दुओं को रातों रात कराची लाहोर कश्मीर बलोच कांधार छोड़ना पड़ा। हिन्दू वाल्मिकी मेगवार समाज के जो लाहौर रुक गए वे मिटा दिये गये, उनकी बहू बेटियां उठा ली गई या उनका जबरन म्लेच्छ से निकाह करा दिया गया।
यह कोरी कल्पना है उनके बता दीजिएगा कि नब्बे के दशक में कश्मीर घाटी से जब कश्मीरी हिंदू अपना सब कुछ छोड़ कर आए? भारत सरकार पूरा संविधान पूरी सेना पूरी सरकारी मशीनरी होते हुए भी एक भी कश्मीरी हिंदू को घाटी में सुरक्षा नहीं दे पाई। पुलिस थी, सेना भी थी, संविधान था, कोर्ट भी था।
हम गाते रह गए - “हस्ती” मिटती नहीं हमारी,,,
और...वो मिटा रहे, हर रोज एक नई “बस्ती” हमारी,,,
जिनको धर्म प्यारा था,उनके 56 देश बन गए । और जिनको देश प्यारा था,उनके देश के छींन-भिन्न होकर टुकड़े हो गए।।
धर्म रहेगा तो हमारी यशोगाथा की कथा कही जाती रहेगी
धर्म नहीं रहा तो हमारी विरासत खंडहर बनकर ढह जाएगी...
जर जोरू जमीन सब यही धारा रह जाएगा .. उसे कोई और भोगेगा जेसे लाहौर का व्यापार, कराची के कारखाने, बांगलादेश का jute उद्योग सब मोमिन के हाथों चला गया
जिंदगी की असली उड़ान – आत्मविश्वास और संघर्ष की प्रेरक कहानी
जिंदगी की असली उड़ान – आत्मविश्वास और संघर्ष की प्रेरक कहानी
यह कहानी है एक साधारण से लड़के की जिसने असाधारण सपना देखा और फिर उस सपने को सच करने के लिए वह सब कुछ किया जो आमतौर पर असंभव माना जाता है। उसका नाम था अर्जुन। एक छोटे से गांव में जन्मा और गरीबी में पला-बढ़ा अर्जुन अपने संघर्षों से कभी नहीं डरा। वह जानता था कि हालात कभी भी उसके पक्ष में नहीं रहेंगे लेकिन आत्मविश्वास और मेहनत उसे वहाँ पहुँचा सकती है जहाँ लोग कल्पना भी नहीं कर सकते।
अर्जुन का परिवार बहुत ही साधारण था। उसके पिता चाय की एक छोटी सी दुकान चलाते थे और माँ घरों में काम करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती थीं। घर में कभी बिजली ठीक से नहीं आती थी और कभी खाने के लिए भी पूरा नहीं होता था। लेकिन इन सबके बीच अर्जुन के अंदर कुछ अलग ही आग थी। वह हर रोज स्कूल जाता था और स्कूल से आने के बाद अपने पिता की दुकान पर बैठता था। वहाँ काम करने के बाद जब सब सो जाते तब वह स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई करता। उसके पास न किताबें थीं और न कोचिंग का सहारा। लेकिन उसकी मेहनत और लगन में कोई कमी नहीं थी।
स्कूल में अक्सर उसके कपड़े फटे होते थे और जूते घिस चुके होते थे। बाकी छात्र उसका मज़ाक उड़ाते थे। कोई कहता कि ये अफसर बनने चला है और किसी ने कहा कि ये तो चाय बेचने के बाद मजदूर बनेगा। लेकिन अर्जुन ने कभी किसी की बात का जवाब नहीं दिया। वह हर बार चुपचाप मुस्कराकर अपने सपने के बारे में सोचता और खुद से कहता कि एक दिन सबको जवाब मिलेगा जब मैं अफसर बनूंगा।
वह अक्सर अपने माँ के पास बैठकर कहता कि माँ एक दिन मैं आपको एक बड़ा घर दूंगा। माँ के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती थी लेकिन उनकी आँखों में चिंता भी होती थी क्योंकि वे जानती थीं कि यह रास्ता बहुत कठिन है। फिर भी उन्होंने कभी बेटे की उम्मीद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। हर बार कहतीं बेटा पढ़ाई मत छोड़ना। तेरे संघर्ष की जीत एक दिन सबके लिए प्रेरणा बनेगी।
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अर्जुन को सरकारी कॉलेज में दाखिला मिल गया वह भी स्कॉलरशिप पर। वहाँ की जिंदगी भी आसान नहीं थी। हॉस्टल नहीं मिला तो वह कहीं रिश्तेदार के घर पर रहा, कभी दोस्तों के साथ और कई बार पार्क में भी रात बितानी पड़ी। अर्जुन के पास किताबें नहीं थीं तो वह लाइब्रेरी में घंटों बैठा रहता। कभी खाने के पैसे नहीं होते तो पानी पीकर पढ़ाई करता।
कॉलेज के बाद उसने सिविल सेवा परीक्षा यानी यूपीएससी की तैयारी शुरू की। पहले प्रयास में वह असफल रहा। उसने हार नहीं मानी। दूसरे प्रयास में भी सफल नहीं हुआ। अब तक परिवार की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो चुकी थी। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब नौकरी कर ले। ये अफसर बनने का सपना छोड़ दे। रिश्तेदार ताना मारते कि तेरा बाप चाय बेचता है और तू अफसर बनने चला है। पड़ोसी मज़ाक उड़ाते कि लड़का पढ़ाई में भी कुछ नहीं कर रहा।
लेकिन अर्जुन की माँ अब भी उस पर विश्वास करती थीं। उन्होंने कहा बेटा अगर तू हार गया तो हम सब हार जाएंगे। तू अपनी लड़ाई लड़ता रह। अर्जुन ने तीसरा प्रयास किया। इस बार उसने खुद से वादा किया था कि या तो सफलता मिलेगी या वह तब तक प्रयास करता रहेगा जब तक सांस चलती है। लेकिन तीसरे प्रयास में भी उसे सफलता नहीं मिली। अब वह पूरी तरह टूट चुका था। वह सोचने लगा कि शायद दुनिया सही कहती है। शायद गरीबों के लिए बड़े सपने देखना पाप है।
पर तभी उसने अपनी माँ की आँखों में देखा। वहाँ अब भी उम्मीद बाकी थी। माँ ने बस इतना कहा बेटा जो सपना तूने देखा है उसे ऐसे अधूरा मत छोड़। एक बार और कोशिश कर। बस एक आखिरी बार।
अर्जुन ने चौथा प्रयास किया। इस बार उसने पहले से ज्यादा तैयारी की। उसने हर विषय को गहराई से पढ़ा। पुराने प्रश्न पत्र हल किए। आत्मविश्वास के साथ मॉक टेस्ट दिए। और सबसे जरूरी उसने खुद पर विश्वास रखा। उसने किसी को कुछ साबित करने के लिए नहीं बल्कि खुद को साबित करने के लिए पढ़ाई की।
रिज़ल्ट वाले दिन वह अपने पापा के साथ दुकान पर ही था। मोबाइल पर जैसे ही उसने परिणाम देखा वह कुछ पल के लिए चुप हो गया। फिर वह जोर से चिल्लाया पापा मैं सफल हो गया। मेरा चयन हो गया। अब मैं अफसर बन गया हूँ।
पिता की आँखों में आँसू आ गए। माँ खुशी से रो पड़ीं। अर्जुन ने कहा अब इस चाय की दुकान पर एक अफसर का बेटा नहीं बल्कि एक अफसर खड़ा है।
गांव में जिसने उसका मज़ाक उड़ाया था अब वही लोग स्वागत के लिए खड़े थे। स्कूल जहाँ उसका मज़ाक उड़ाया जाता था वहाँ अब उसे मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया। उसने स्टेज पर खड़े होकर कहा मैं गरीब था लेकिन मेरे सपने अमीर थे। मेरे पास सुविधाएँ नहीं थीं लेकिन मेरे पास आत्मविश्वास था। अगर आपके पास आत्मविश्वास और मेहनत है तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं है।
आज अर्जुन एक सफल अधिकारी है और साथ ही युवाओं के लिए प्रेरणा भी। वह गरीब बच्चों को मुफ्त में गाइड करता है ताकि कोई और अर्जुन बिना सहायता के संघर्ष ना करे। उसका कहना है कि जब तक खुद पर विश्वास है तब तक कोई भी बाधा बड़ी नहीं हो सकती।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में संघर्ष तो आते ही हैं। लेकिन अगर आपके पास आत्मविश्वास है तो आप किसी भी परिस्थिति को बदल सकते हैं। गरीब होना कोई दोष नहीं है। हिम्मत हार जाना असली हार है। अर्जुन ने परिस्थितियों से लड़कर न सिर्फ खुद को साबित किया बल्कि अपने परिवार और समाज को भी गर्वित किया।
जीवन में कभी हालात पर रोने से कुछ नहीं होता। अगर कुछ बदलना है तो खुद को मजबूत बनाना पड़ता है। अगर मंज़िल पानी है तो रास्तों से डरना छोड़ना होगा। अर्जुन ने अपने जीवन से ये सबक दिया कि अगर सच्ची लगन और आत्मविश्वास हो तो कोई भी सपना बड़ा नहीं होता।
आज भी जब कोई हताश होकर कहता है कि मेरे पास कुछ नहीं है तो अर्जुन की कहानी उसे याद दिलाती है कि सब कुछ न होने के बावजूद सब कुछ पाया जा सकता है अगर आत्मविश्वास जिन्दा हो।
बुजुर्गों का साया
बुजुर्गों का साया
बात बिहार के एक गाँव की है। एक परिवार के बड़े बेटे का पास वाले गाँव की एक लड़की से रिश्ता पक्का हुआ। जब विवाह की तारीख नजदीक आने लगी, उस समय लड़की के पिता ने एक अजीब-सी शर्त रख दी। शर्त थी कि, "लड़के वाले बारात में अपने साथ किसी भी बुजुर्ग को नहीं लायेंगे। बारात के साथ अगर कोई भी बुज़ुर्ग आयेगें तो हम लड़की की विदाई नहीं करेंगे।"
शर्त सुनकर सभी हैरान रह गए, दो दिन बचे थे शादी में अगर बारात नहीं लेकर गए तो अपने ही गाँव में बदनामी हो जाएगी! और अगर बुजुर्गों को बारात में साथ लेकर गए और कहीं फेरे लेने से इनकार कर दिया तो और अधिक बदनामी हो जाएगी। सभी लोग परेशान हो गए सभी एक ही बात कर रहे थे कि, "बुजुर्गों के बिना कैसा विवाह?"
पर अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। आखिर में बड़े भारी मन से लड़के के पिता ने कहा कि बारात जाएगी और वह भी बिना बुज़ुर्गों के!
बाकी तो घर और परिवार के सभी बुजुर्ग मान गए, पर लड़के के ताऊजी जिद पर अड़ गए। वे कहने लगे, "यह भी कोई बात हुई। बड़ों के बिना विवाह! यह कैसे हो सकता है? मैं तो शादी में जाकर ही रहूँगा। देखता हूँ मुझे कौन रोकता है।" घर वालो ने ताऊजी को मनाने की बहुत कोशिश की, पर वे माने ही नहीं।
आखिर में यह तय किया गया कि उन्हें कपड़ो की गठरियों के बीच में छुपा कर ले जायेंगे। और उनसे कहा गया कि वे सामने नहीं आयेंगे। सबके ज़ोर भरने पर इस बात के लिए ताऊजी मान गए कि वे सबके सामने नहीं आएंगे।
विवाह के दिन बारात वहाँ पहुँची। लड़की वालों ने उनका स्वागत किया, साथ ही लड़की के पिता ने एक और शर्त रख दी। उस गाँव के बाहर एक नदी बहती थी। लड़की के पिता ने कहा कि, "इस नदी में पानी की जगह दूध की धारा बहाओ तो ही यह शादी होगी और हमारी बेटी की विदाई होगी। वरना यह शादी नहीं होगी। यह शर्त सुनकर तो सभी के होश उड़ गए। पूरी नदी में दूध को बहाना, यह तो असंभव है। सभी चिंता में डूब गए।
बहुत मनाया, बहुत समझाया, मिन्नतें की, लेकिन लड़की के पिता तो अपनी शर्त पर अड़ गए और कहा कि "अगर मेरी शर्त पूरी करोगे तो ही यह विवाह होगा।"
यह तो असम्भव था, तो लड़के वालों ने तय किया कि, "चलो बारात वापस लेकर चलें। शर्त पूरी नहीं कर सकते।" जब यह बात बैलगाड़ी में छुपे हुए ताऊजी के कानों में पड़ी। तो वे बाहर निकल आये और बोले कि, "क्या हुआ? हम बारात वापस क्यों लेकर जा रहे है। यह हमारी शान के खिलाफ है।"
तब किसी ने ताऊजी से कहा कि, "लड़की के पिता ने शर्त रखी है कि नदी में पानी की जगह दूध को बहाओ तो ही लड़की से विवाह होगा और विदाई होगी। अब आप ही बताएँ ताऊजी क्या यह संभव है, दूध की नदी बहाना! इसलिए बारात वापिस लेकर जा रहें है।"
यह सुनकर ताऊजी बोले, "बस इतनी-सी बात! इतनी-सी बात के लिए तुम बारात वापस लेकर जा रहे हो। जाओ उनको संदेशा भिजवाओ कि हम इस नदी में पानी की जगह दूध की धारा बहाने को तैयार है। लेकिन पहले इस नदी के पानी को खाली करवाओ।"
यह सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग बहुत खुश हो गए यह तो किसी के दिमाग में पहले आया ही नही। सभी खुशी से झूम उठे। दो बाराती लड़की के पिता के पास गए और उनसे कहा कि, "हमे आपकी शर्त मंजूर है, हम नदी में दूध बहाने के लिए तैयार है पर पहले नदी के पानी को खाली करवाओ।"
जैसे ही लड़की के पिता ने ये बात सुनी, उन्होंने झट से कहा कि बारात में तुम किसी बुजुर्ग को अवश्य लाये हो!
और फिर लड़की के पिता ने मुस्कराते हुए कहा विवाह अवश्य होगा और वह भी सभी बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद से!
तब किसी ने लड़की के पिता से पूछा कि फिर आपने ये शर्ते क्यों रखी।
तब लड़की के पिता ने कहा, "मैं तो बस आज के युवाओं को ये सबक देना चाहता था कि आधुनिकता की होड़ में वे इतना आगे निकल गए है कि अपने बड़ो के प्यार और अनुभवों को बेकार समझने लगे हैं। आज उन्होंने जान लिया होगा कि बारात में अगर ताऊजी नहीं आते तो क्या होता?
दोस्तों कहानी तो यहाँ खत्म होती है, पर हम सभी के लिए एक गहरा प्रश्न छोड़ रही है। जीवन में हम जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, दौड़ रहे हैं और कहीं ना कहीं तनाव और अकेलेपन के घेरे में पड़ गए हैं। उसकी वजह कहीं यह तो नहीं की हमारे सर से हमारे बुजुर्गों का साया दूर होता जा रहा है। हम और हमारे बुजुर्गों के बीच कहीं गहरी खाई तो नहीं बन गई है?
इस खाई को हम कैसे पार करें?
"इस पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान की महत्ता को आज समझना हमें भविष्य के लिए तैयार करेगा। इसके बाद, आपके बुज़ुर्ग होने पर, जो ज्ञान आप साझा करेंगे, उसे भावी पीढ़ी आगे ले जाएगी।"
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बुजुर्गों का साया
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दुनिया के दस सबसे ऊंचे पर्वत
दुनिया के दस सबसे ऊंचे पर्वत
दुनिया के 10 सबसे ऊंचे पर्वत
सारांश
1. माउंट एवरेस्ट: 8,848 मीटर
2 . K2: 8,611 मीटर
3. कंचनजंगा: 8,586 मीटर
4. लोत्से: 8,516 मीटर
5 . मकालू I: 8,481 मीटर
6. चो ओयू: 8188 मीटर
7. धौलागिरी: 8167 मीटर
8. मनास्लू: 8,156 मीटर
9. नंगा पर्वत: 8,126 मीटर
10. अन्नपूर्णा: 8,091 मीटर
01 माउंट एवरेस्ट: 8,848 मीटर
माउंट एवरेस्ट सात शिखरों में से एक है, जो सात महाद्वीपों पर स्थित सबसे ऊंचे पर्वत हैं।
माउंट एवरेस्ट, ग्रह की सबसे ऊंची चोटी
माउंट एवरेस्ट हिमालय पर्वतमाला में स्थित है और 8,848 मीटर की ऊंचाई के साथ यह विश्व का सबसे ऊंचा बिंदु है। यह सात शिखरों में से एक है, जो सात महाद्वीपों पर स्थित सबसे ऊंचे पर्वत हैं। सर एडमंड हिलेरी और तेनज़िंग नोर्गे ने 29 मई, 1953 को इस विशाल पर्वत पर पहली बार चढ़ाई की थी। 25 साल बाद, 8 मई, 1978 को, रीनहोल्ड मेसनर और पीटर हैबेलर बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के पहली बार शिखर पर पहुंचने में सफल रहे।
सबसे युवा पर्वतारोही अमेरिकी जॉर्डन रोमेरो हैं, जो 2010 में 13 वर्ष की आयु में अंतिम पठार पर पहुंचे थे। 80 वर्ष की आयु में, जापानी युइचिरो मिउरा 2013 में इस शिखर पर पहुंचने वाले सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बने। वह 8,000 मीटर या उससे अधिक की ऊंचाई तक पहुंचने वाले सबसे बुजुर्ग व्यक्ति भी बने।
आज, माउंट एवरेस्ट पर 20 मार्ग हैं - दो मानक मार्ग दक्षिणी मार्ग और उत्तरी मार्ग हैं, अन्य मार्ग तकनीकी रूप से काफी अधिक चुनौतीपूर्ण हैं और उनमें से अधिकांश पर केवल एक बार ही चढ़ाई की गई है। लक्ष्य हमेशा एक ही होता है: शिखर पठार तक पहुंचना।
02 K2: 8,611 मीटर
के2 विश्व का दूसरा सबसे ऊंचा पर्वत है और काराकोरम पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है, जो उत्तरी पाकिस्तान, भारत और पश्चिमी चीन के बीच फैली हुई है।
K2, विश्व का सबसे कठिन पर्वत?
8,611 मीटर की ऊंचाई पर, K2 दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा पर्वत है और काराकोरम में स्थित है, जो एक पर्वत श्रृंखला है जो उत्तरी पाकिस्तान, भारत और पश्चिमी चीन के बीच फैली हुई है और इसमें तीन अन्य 8,000 मीटर ऊंची चोटियां हैं: ब्रॉड पीक (8,051 मीटर), गशेरब्रुम I ("छिपी हुई चोटी", 8,080 मीटर) और गशेरब्रुम II (8,034 मीटर)।
पर्वतारोहण से संबंधित अधिक समाचार:
पर्वतारोहियों के अनुसार के2, चौदह 8,000 मीटर ऊंची चोटियों में सबसे कठिन है, तथा माउंट एवरेस्ट से भी अधिक कठिन है। पहली सफल चढ़ाई 31 जुलाई 1954 को अचिल कॉम्पैग्नोनी और लिनो लैसेडेली द्वारा की गई थी, और 1977 तक एक जापानी अभियान को दूसरी चढ़ाई में सफलता नहीं मिली, लेकिन उसी मार्ग से नहीं। 1986 में, पहली चढ़ाई अत्यंत कठिन और खतरनाक दक्षिणी मुख से होकर की गई थी - आज तक, कोई भी अन्य पर्वतारोही इस मुख पर दोबारा चढ़ने में सक्षम नहीं हो पाया है, क्योंकि रीनहोल्ड मेसनर ने इसे आत्मघाती बताया था।
अब तक 302 आरोहणों में से 298 विभिन्न पर्वतारोहियों ने के2 पर विजय प्राप्त की है, जिनमें 11 महिलाएं भी शामिल हैं। केवल चार पर्वतारोही ही ऐसा दो बार कर पाए हैं।
2018 में, आंद्रेज बार्गीएल ने पहाड़ से नीचे स्कीइंग करके असंभव को भी संभव करने का प्रयास किया:
03 कंचनजंगा: 8,586 मीटर
कंचनजंगा विश्व का तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत है।
एक पर्वत और 8,000 मीटर से अधिक ऊँची चार चोटियाँ।
8,586 मीटर ऊंचा कंचनजंगा पृथ्वी पर तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत है। मुख्य शिखर के अतिरिक्त इसमें 8,000 मीटर से अधिक ऊँची तीन अन्य चोटियाँ भी हैं। जॉर्ज बैंड और जो ब्राउन ने 25 मई 1955 को पहली चढ़ाई की, लेकिन सिक्किम के लोगों की आस्था के सम्मान में अंतिम पठार से कुछ कदम पहले ही रुक गए, क्योंकि सिक्किम के लोग इस चोटी को एक पवित्र पर्वत मानते हैं। कई सफल आरोहणों ने इस परंपरा को कायम रखा है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि ऊंचाई के अंतिम कुछ मीटर अब चढ़ाई में कोई कठिनाई नहीं पैदा करते।
ऑस्ट्रियाई गेरलिंडे कालटेनब्रनर 2006 में सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंचने वाली दूसरी महिला थीं, उनसे पहले गिनेट हैरिसन (1998) थीं। कल्टेनब्रनर 8,000 मीटर से अधिक ऊंची सभी 14 चोटियों पर चढ़ने वाली तीसरी महिला हैं, तथा बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन लिए ऐसा करने वाली पहली महिला हैं।
04 लोत्से: 8,516 मीटर
पृथ्वी पर चौथा सबसे ऊँचा पर्वत ल्होत्से है।
लोत्से, मेसनर की परियोजना का अंतिम बिंदु
ग्रह पर चौथा सबसे ऊंचा पर्वत, पहले पर्वत माउंट एवरेस्ट के बराबर है। दोनों ही हिमालय पर्वतमाला का हिस्सा हैं और तिब्बती भाषा में "ल्होत्से" शब्द का अर्थ "दक्षिणी शिखर" होता है। साउथ पास से, जिसकी ऊंचाई 7,986 मीटर है, 3,000 मीटर से अधिक ऊंची चट्टानें निकलती हैं, जो कि भारी गिरावट और अत्यधिक ऊंचाई के कारण, ग्रह पर सबसे कठिन और खतरनाक दीवारों में से एक हैं।
अधिक समाचार:
05 मकालू I: 8,481 मीटर
माउंट एवरेस्ट के पूर्व में स्थित मकालू विश्व के सबसे ऊंचे पर्वतों में से एक है।
मकालू हिमालय पर्वतमाला का हिस्सा है
मकालू माउंट एवरेस्ट के पूर्व में, नेपाल और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। इस पर पहली बार 1955 में चढ़ाई की गई थी। इस चढ़ाई की अनोखी विशेषता यह है कि नौ सदस्यीय अभियान दल के सभी सदस्य सबसे ऊंचे बिंदु तक पहुंचने में सफल रहे, जो 8,000 मीटर और उससे अधिक ऊंची चोटियों पर चढ़ाई करने का पहला प्रयास था। 2009 तक पहली महिला मकालू की चोटी पर नहीं पहुंच सकी थी।
06 चो ओयू: 8188 मीटर
8,188 मीटर ऊंचा चो ओयू हिमालय पर्वतमाला का हिस्सा है और दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वतों में से एक है।
8,000 मीटर की चोटियों में से सबसे “आसान” कौन सी है?
लोत्से और मकालू की तरह चो ओयू भी हिमालय पर्वतमाला का हिस्सा है। 8,188 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पर्वत पर 1954 में हर्बर्ट टिची, तोसेफ जोचलर और पासंग द्वामा लामा ने विजय प्राप्त की थी। 1970 तक कोई अन्य अभियान शिखर तक पहुंचने में सफल नहीं हुआ।
07 धौलागिरी: 8167 मीटर
धौलागिरी को 1838 तक पृथ्वी की सबसे ऊंची चोटी माना जाता था।
धौलागिरी, विमान द्वारा पहली चढ़ाई का एक विशेषाधिकार प्राप्त गवाह।
"व्हाइट माउंटेन" पहली 8,000 मीटर ऊंची चोटी थी जिसे खोजा गया था और इसे 1838 तक ग्रह पर सबसे ऊंची चोटी माना जाता था। हालांकि, यह 1960 में पहली बार चढ़ाई जाने वाली दूसरी सबसे आखिरी चोटी थी। इस अभियान की खास बात यह थी कि पर्वतारोहण के इतिहास में पहली बार और अनोखे ढंग से, अभियान के उपकरण और सदस्यों को छोटे विमान से 5,700 मीटर की ऊंचाई पर बेस कैंप 2 तक ले जाया गया था।
08 मनास्लू: 8,156 मीटर
माउंट मनास्लू दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वतों में से एक है।
क्या आप माउंट मनास्लू से नीचे की ओर जाना चाहते हैं?
"मनस्लु" नाम संस्कृत (हिंदू धार्मिक ग्रंथों की भाषा) से आया है और इसका अर्थ है "आत्मा का पर्वत।" 1956 में, मनास्लू पर पहली बार एक जापानी अभियान दल ने उत्तर-पूर्वी दिशा से चढ़ाई की थी। 1981 में, दो ऑस्ट्रियाई लोगों, सेप मिलिंगर और पीटर वोर्गोटर ने 8,000 मीटर ऊंची चोटी पर चढ़ाई के बाद दुनिया की पहली स्की अवरोहण को सफलतापूर्वक पूरा किया।
09. नंगा पर्वत: 8,126 मीटर
नंगा पर्वत हिमालय के पश्चिमी भाग में स्थित एकमात्र 8,000 मीटर ऊंचा दर्रा है। इसे पृथ्वी पर सबसे बड़ा दृश्यमान और पृथक पर्वत शिखर माना जाता है, इसके अलावा, दक्षिण में स्थित पर्वत शिखर (रूपल पार्श्व) 4,500 मीटर ऊंचा होने के साथ पृथ्वी पर सबसे ऊंचा पर्वत शिखर है। नंगा पर्वत को पर्वतारोहियों द्वारा सबसे कठिन 8,000 मीटर की चोटियों में से एक माना जाता है, यहां तक कि सामान्य, तथाकथित "आसान" मार्ग (किन्सहोफर मार्ग) भी हिमस्खलन और चट्टानों के गिरने के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 3 जुलाई 1953 को ऑस्ट्रियाई हरमन बुहल ने पहली चढ़ाई की - तब तक, पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश में 31 लोग मर चुके थे।
1970 में, भाइयों गुंथर और रीनहोल्ड मेसनर ने पहली बार अत्यंत कठिन रुपाल फेस (दक्षिण फेस) पर चढ़ाई की और नंगा पर्वत पर भी पहली चढ़ाई की। गुंथर मेसनर की उतरते समय मृत्यु हो गई।
10 अन्नपूर्णा: 8,091 मीटर
अन्नपूर्णा भी हिमालय में स्थित है और 8,000 मीटर ऊंची यह चोटी सबसे कम चढ़ाई जाने वाली चोटी है, साथ ही यह सबसे खतरनाक भी है। मार्च 2012 तक केवल 190 पर्वतारोही ही शिखर तक पहुंच पाए थे, जबकि 61 पर्वतारोहियों की वहां मृत्यु हो चुकी थी - फिर भी, 3 जून 1950 को इसकी पहली चढ़ाई के साथ, यह इतिहास का पहला 8,000 मीटर ऊंचा पर्वत था जिस पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की गई थी। अन्नपूर्णा में हिमस्खलन का अत्यधिक खतरा रहता है - प्रत्येक तीन सफल आरोहणों पर एक व्यक्ति की मृत्यु होती है।
दुनिया की 10 सबसे ऊंची इमारतें
दुनिया की 10 सबसे ऊंची इमारतें: वे क्या हैं और कहां हैं?
क्या आप जानते हैं कि दुनिया की 10 सबसे ऊंची इमारतें कौन सी हैं और वे कहाँ स्थित हैं? सिविटैटिस पत्रिका में हम इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।
क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें कौन सी हैं? आज, वे दुनिया भर के प्रमुख शहरों में पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण और आकर्षण हैं। मनुष्य आकाश पर विजय पाने पर जोर देते हैं, और ये विशाल निर्माण एक अनूठा अनुभव प्रदान करते हैं। सिविटैटिस में, हम विश्व की 10 सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारतों की एक सूची संकलित करना चाहते थे, ताकि पता चल सके कि वे कहां स्थित हैं और उन्हें क्या विशिष्ट बनाता है। आइये उनसे मिलें!
1. बुर्ज खलीफा, दुबई (संयुक्त अरब अमीरात)
विश्व की सबसे ऊंची इमारत कौन सी है? इसकी 828 मीटर ऊंचाई और 163 मंजिलें बुर्ज खलीफा को दुनिया की 10 सबसे ऊंची इमारतों की सूची में सीधे शीर्ष पर रखती हैं। इसका निर्माण 2004 में शुरू हुआ और यह 2010 में पूरा हुआ, जो कि निर्धारित समय से एक वर्ष देरी थी, और यह 95 किलोमीटर दूर से दिखाई देता है।
यह दुबई के दर्शनीय आकर्षणों में से एक है और इसमें दो अवलोकन मंच हैं, जिनसे अद्भुत दृश्य दिखाई देते हैं। जिज्ञासावश, क्या आप जानते हैं कि यह न्यूयॉर्क स्थित एम्पायर स्टेट बिल्डिंग से दोगुनी ऊंची है?
यदि आप इमारत का दौरा करना चाहते हैं, तो आप मानक बुर्ज खलीफा टिकट ऑनलाइन बुक कर सकते हैं , जो आपको 124वीं और 125वीं मंजिलों पर जाने की अनुमति देगा, या 148वीं मंजिल का टिकट चुन सकते हैं, जो आपको गगनचुंबी इमारत की सबसे शानदार वेधशाला तक ले जाएगा। आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे! और यदि आप और भी अधिक व्यापक योजना की तलाश में हैं, तो आप बुर्ज खलीफा और स्काई व्यूज़ वेधशाला के लिए एक संयुक्त टिकट खरीद सकते हैं ।
2. मर्डेका 118, कुआलालंपुर (मलेशिया)
मर्डेका पीएनबी118 दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची इमारत है और यह भी एशिया में, विशेष रूप से मलेशिया में स्थित है। इसकी लम्बाई 679 मीटर है , इसमें 100 मंजिलें हैं और यह नव-भविष्यवादी शैली में बना है। यह भवन, जिसमें होटल, घर और कार्यालय हैं, दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रतीक बन गया है।
यह परियोजना विवादों से अछूती नहीं रही, क्योंकि इसके निर्माण पर लगभग 5 बिलियन यूरो की लागत आई थी । यह एक महत्वपूर्ण निवेश है, जिसे समाज के कुछ क्षेत्रों के लिए अन्य अधिक आवश्यक सेवाओं पर खर्च किया जा सकता था। विवाद से परे, सच्चाई यह है कि यह गगनचुंबी इमारत कुआलालंपुर के क्षितिज पर छाई हुई है और इसने समकालीन इंजीनियरिंग के लिए चुनौती पेश की है।

3. शंघाई टॉवर, शंघाई (चीन)
दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में से एक शंघाई टॉवर है, जिसकी ऊंचाई 632 मीटर है । यह भवन पुडोंग वित्तीय जिले में स्थित है और इसकी विशेषता यह है कि इसके अग्रभाग पर 270 पवन टर्बाइन लगे हुए हैं। इसके अलावा, इसमें 106 लिफ्ट हैं जो 18 मीटर प्रति सेकंड की गति से चलती हैं। आंकड़े सचमुच आश्चर्यजनक हैं।
यदि आप शंघाई टॉवर और साथ ही देश के सबसे आधुनिक हिस्से को देखना चाहते हैं, तो हम आधुनिक शंघाई के निजी निर्देशित दौरे में भाग लेने की सलाह देते हैं ।

4. अबराज अल-बैत, मक्का (सऊदी अरब)
अबराज अल-बैत क्लॉक टॉवर अपनी 601 मीटर की ऊंचाई के कारण दुनिया की पांच सबसे ऊंची इमारतों में से एक है । यह इमारत मक्का की ग्रैंड मस्जिद के बगल में स्थित शानदार होटलों के परिसर का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य शहर को आधुनिक बनाना है।
इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल के बगल में निर्मित इस गगनचुंबी इमारत में एक प्रार्थना कक्ष भी है, जिसमें 4,000 से अधिक लोगों की क्षमता है। वास्तव में, अबराज अल-बैत न केवल अपनी ऊंचाई के कारण प्रसिद्ध है, बल्कि अपने क्षेत्रफल के कारण यह दुनिया की सबसे बड़ी इमारतों में से एक है।

5. पिंग एन फाइनेंस सेंटर, शेन्ज़ेन (चीन)
पिंग एन फाइनेंस सेंटर चीन के गुआंगडोंग प्रांत के शेनझेन में स्थित एक भव्य गगनचुंबी इमारत है। इसकी 599 मीटर की ऊंचाई के कारण इसे दुनिया की 10 सबसे ऊंची इमारतों में पांचवां स्थान दिया गया है । एक अतिरिक्त बोनस के रूप में, इसकी विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक कोने पर चार स्तंभ हैं जो बढ़ने के साथ संकीर्ण होते जाते हैं, तथा इसके शीर्ष पर एक अवलोकन मंच बन जाता है।
शीर्ष पर पहुंचने के लिए आपको केवल 80 लिफ्टों में से किसी एक पर चढ़ना होगा, जो 36 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती हैं। क्या आप में हिम्मत है?

6. लोट्टे वर्ल्ड टॉवर, सियोल (दक्षिण कोरिया)
556 मीटर ऊंचा लोट्टे वर्ल्ड टॉवर सियोल के क्षितिज का शिखर है और यह दुनिया की छठी सबसे ऊंची इमारत होने का दावा करता है। आप दुनिया की सबसे ऊंची कांच की फर्श वाली वेधशाला , सियोल स्काई के लिए टिकट बुक करके टॉवर के मुख्य आकर्षणों में से एक को देख सकते हैं। यह अवलोकन डेक 478 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और दक्षिण कोरियाई राजधानी का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। यह प्रभावशाली पर्यटक आकर्षण प्रसिद्ध गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अकारण ही शामिल नहीं हुआ है।

7. वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, न्यूयॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका)
वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बारे में हम ऐसा क्या कह सकते हैं जो पहले से ज्ञात न हो? यह निस्संदेह दुनिया की सबसे अधिक पहचानी जाने वाली और प्रसिद्ध ऊंची इमारतों में से एक है। यह 546 मीटर ऊंचा है , इसमें 110 मंजिलें हैं और इसका निर्माण केवल आठ वर्षों में हुआ है। यह पश्चिमी गोलार्ध की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत है!
हालाँकि, इसका निर्माण 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों की त्रासदी से चिह्नित था। वास्तव में, इमारत के आयाम अत्यधिक प्रतीकात्मक हैं। इसकी ऊंचाई ट्विन टावर्स के बराबर है, और यदि आप इसमें ध्वजस्तंभ जोड़ दें तो यह आंकड़ा 1,776 फीट हो जाता है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा का ठीक वही वर्ष है।
वन वर्ल्ड ऑब्ज़र्वेटरी के लिए ऑनलाइन टिकट खरीदकर, आप बिग एप्पल क्षितिज के सबसे अच्छे दृश्यों में से एक का आनंद ले पाएंगे , क्योंकि मैनहट्टन की सबसे ऊंची इमारतें इस वेधशाला से पूरी तरह से दिखाई देती हैं। इस पर्यटक आकर्षण का एक और लाभ यह है कि यह पूरी तरह से घर के अंदर है, इसलिए यह एक आदर्श योजना है यदि आप सोच रहे हैं कि न्यूयॉर्क में बारिश के दिन क्या करना है ।

8. सीटीएफ फाइनेंस सेंटर, गुआंगज़ौ (चीन)
530 मीटर ऊंचा चाउ ताई फूक फाइनेंस सेंटर यह दर्शाता है कि चीन दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों की इस सूची में सबसे बड़ी उपस्थिति वाले देशों में से एक है। इसका डिज़ाइन इसके मुख्य आकर्षणों में से एक है, क्योंकि इसे इसकी ऊर्ध्वाधरता पर जोर देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऐसा लगता है जैसे यह आकाश को छूने के लिए ऊपर उठ रहा है।
यह गगनचुंबी इमारत कैंटन शहर में स्थित है, जिसे चीनी भाषा में गुआंगज़ौ के नाम से जाना जाता है। इसमें कुल 111 मंजिलें हैं और इसका निर्माण 2016 में पूरा हुआ था, जिसमें कार्यालय, होटल और आवासीय इकाइयां हैं। यदि आप वहां यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, तो आप पर्ल नदी पर रात्रि क्रूज का आनंद लेते हुए इमारत की सुंदरता की प्रशंसा कर सकते हैं ।

9. तियानजिन सीटीएफ फाइनेंस सेंटर, तियानजिन (चीन)
कैंटन शहर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए, तियानजिन शहर में भी दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में से एक है, जिसकी ऊंचाई 530 मीटर है । व्यापार और वित्त केंद्र के रूप में प्रयुक्त, टियांजिन सीटीएफ वित्त केंद्र अपनी विशिष्ट वास्तुकला के कारण ध्यान आकर्षित करता है, जिसका श्रेय इसकी संरचना की लहरदार वक्रता, झरोखों और गोल शीर्ष को जाता है। हम इसे विश्व की 10 सबसे ऊंची इमारतों की सूची में शामिल करने से खुद को रोक नहीं सके!
इस इमारत की ऊंचाई पास में स्थित गोल्डिन फाइनेंस 117 से अधिक है, जो पहले से ही निर्मित है और इसकी लंबाई 597 मीटर है। हालाँकि, चूंकि इसे आधिकारिक तौर पर अंतिम रूप नहीं दिया गया है, इसलिए इसे फिलहाल इस सूची से बाहर रखा गया है।

10. सीआईटीआईसी टॉवर, बीजिंग (चीन)
दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों की हमारी सूची को समाप्त करने के लिए, हम बीजिंग की ओर बढ़ते हैं, विशेष रूप से केंद्रीय व्यापारिक जिले की ओर। यहां 528 मीटर ऊंचा सीआईटीआईसी टॉवर है । इसका उपनाम चाइना ज़ून टॉवर रखा गया है क्योंकि इसका डिज़ाइन प्राचीन चीनी शराब कंटेनर ज़ून से प्रेरित है। उत्सुकता है न?
इसका निर्माण कार्य 2011 में शुरू हुआ और 2018 में इसका उद्घाटन किया गया, जो चीनी राजधानी की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत बन गई। यदि आप इस शहर की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो बीजिंग में भ्रमण, निर्देशित पर्यटन और गतिविधियों पर हमारे व्यापक अनुभाग को देखने में संकोच न करें ।

विश्व की अगली सबसे ऊंची इमारत कौन सी होगी?
जैसा कि हमने देखा है, आकाश की कोई सीमा नहीं है, और वास्तुकारों की एक बड़ी योजना वर्तमान विशालकाय इमारतों के आयामों को पार करना है। इस दिशा में एक बड़ी परियोजना है जो इस रैंकिंग को बदल सकती है और दुनिया की नई सबसे ऊंची इमारत के रूप में प्रथम स्थान प्राप्त कर सकती है।
2013 में सऊदी अरब के जेद्दा में जेद्दा टॉवर का निर्माण शुरू हुआ था । इसके मुख्य वास्तुकार अमेरिकी एड्रियन स्मिथ हैं, जिनके पास व्यापक अनुभव है क्योंकि वे बुर्ज खलीफा के निर्माण के पीछे थे।
इसे किंगडम टॉवर के नाम से भी जाना जाता है , इसका लक्ष्य 1,000 मीटर ऊंची इमारत बनना है । हालाँकि, यह अभी भी अज्ञात है कि यह महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी हो पाएगी या नहीं, क्योंकि इसके कार्य में राजनीतिक और तकनीकी समस्याएं आ रही हैं। क्या यह विश्व की अगली सबसे ऊंची इमारत बन जायेगी? इसका उत्तर केवल समय के पास है!
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