कुम्भ मेला क्यों मनाया जाता है और कहा कहा मनाया जाता है इसका धार्मिक महत्व क्या है?
जिस दशरथ मांझी ने पहाड़ का चीरा था सीना
पत्नी की मोहब्बत में जिस दशरथ मांझी ने पहाड़ का चीरा था सीना,
जब भी पहाड़ तोड़ने की बात होगी पर्वत पुरुष दशरथ मांझी की बात होगी. जब भी तबीयत से पत्थर फेंक कर आसमां में सुराख करने की बात होगी तब माउंटेन मैन को याद किया जाएगा. जब-जब प्रेम के प्रतीकों की बात होगी तब-तब उस पहाड़ का भी जिक्र होगा जिसका सीना चीर दशरथ मांझी ने रास्ता बनाया.
पत्नी के प्यार में पहाड़ का सीना चीरा
जीतनराम मांझी की पर्वत पुरुष के लिए भारत रत्न की मांग के बाद दशरथ मांझी फिर चर्चा में हैं. वो दशरथ मांझी जिन्होंने पत्नी के प्यार में पहाड़ का सीना चीर दिया. इसके बाद जब भी पहाड़ तोडने की बात होगी तब पर्वत पुरुष दशरथ मांझी की बात होगी. जब भी तबीयत से पत्थर फेंक कर आसमां में सुराख करने की बात होगी तब माउंटेन मैन दशरथ मांझी की बात होगी. जब-जब प्रेम प्रतीकों की चर्चा होगी तब-तब बड़े-बड़े प्रेम प्रतीकों के साथ उस पहाड़ का भी जिक्र होगा जिसका सीना चीर दशरथ मांझी ने रास्ता बनाया है.
राजा महाराजा नहीं मजदूर की प्रेम कहानी
दशरथ मांझी की प्रेम कहानी किसी राजा महाराजा की प्रेम कहानी नहीं है. किसी नेता अभिनेता की प्रेम कहानी नहीं, यह कहानी एक मामूली मजदूर की है जिसने अपने हाथों से 22 साल तक उस, पहाड़ को काटा जिसकी वजह से उसकी पत्नी की मौत हो गई. दरअसल गया के गहलौर गांव के मजदूर दशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी रोज पहाड़ पार कर अपने पति को खाना-पानी देने जाती थीं. एक दिन खाना ले जाने के दौरान पत्थर से पैर फिसल गया और उनकी मौत हो गई. तब दशरथ मांझी ने यह ठान लिया कि जिस पहाड़ की वजह से उनकी पत्नी की जान गई वह उसे काटकर रास्ता बना देंगे. इसके बाद 22 सालों तक गर्मी, जाड़ा,बरसात पागलों की तरह पहाड़ की चट्टानों को काटते रहे और तबतक काटते रहे जब पहाड़ के सीने को चीर कर चौड़ी सड़क नहीं बना दी.
पूरी दुनिया में गहलौर गांव की चर्चा
17 अगस्त 2007 को दशरथ मांझी ने भी अंतिम सांस ली. दशरथ मांझी ने पत्नी की याद में गया के गहलौर गांव में जिस पहाड़ को काट कर सड़क बनाया था उसे अब दशरथ मांझी पथ कहा जाता है .वहां मांझी के स्मारक स्थल और उनके नाम पर द्वार बनाए गए हैं. आज वहां उस अनोखी प्रेम कहानी को महसूस करने के लिए देश विदेश से लोग आते हैं.
ये सच्ची कहानी 'माउण्टेन मैन' और करिश्माई शख्स दशरथ मांझी की है, जो बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव 'गहलौर' के रहने वाले थे. जिन्होंने अपनी पत्नी के खातिर बड़े पहाड़ का सीना छेनी और हथौड़ी के दम पर चीर डाला था. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी पहाड़ काटने में लगा दी. उन्होंने ना रात देखा और ना दिन, ना बारिश की परवाह की और ना हीं कपकपाती ठंड की, बस जुनून था कि सड़क बनानी है और 22 वर्षों के कठिन तपस्या और बुलंद हौसलों के दम पर बना हीं डाला.
"भगवान के भरोसे मत बैठिए, पता नहीं भगवान हमारे भरोसे बैठे हों"
ऊपर की ये लाईन पर्वत पुरुष दशरथ मांझी ने बोली थी. ये लाईन हीं उनके विराट पौरुष के साथ एक जुनूनी हृदय संकल्पित व्यक्तित्व का परिचायक है. जिसको उन्होंने अपने कठोर 22वर्षों के निरंतर परिश्रम से चरितार्थ तथा पारदर्शित किया है वह भी बिना रूके, बिना थके. बस वे तपस्वी के भांति डटे और टिके रहे, अंत में दशरथ मांझी के जुनून के सामने विशाल पहाड़ भी हार मान गया. अंत में उनके अपार हौसला के सामने पहाड़ भी नतमस्तक हो गया.
उनके व्यक्तित्व के अंदर एक अलग प्रकार का जिद्द था जो उनको ललकारता था कि तुम कमजोर हो, तुम आलसी हो, तुम असमर्थ हो जिसको उन्हें पटखनी देनाी थी, पराजित करना था उसमें भी पूरे शानो-शौकत और शोहरत के साथ. उस गर्व के साथ कि हम कमजोर भी नहीं है और आलसी भी नहीं है बस शुरू कब करना था ये हमको मालूम नहीं था.
अब जब विकट परिस्थिति ने हमको मालूम करवाया, तब हम रूकेंगे नहीं तुमको पराजित करके शिरमौर बनना है, सोये हुए समाज और सरकार को जगाना है. असमर्थवान का आवाज बनना है. बस उस दिन से उनका तपस्या शुरु हो गया और आंख में अपने धर्मपत्नी फगुनिया के लिए आंसू भी थे जो उनको भरोसा भी दे रहे थे कि अब कोई फगुनिया इस पहाड़ से ना हीं गिरेगी. ऊंचे पहाड़ के कारण व रोड न रहने के अभाव में समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने के कारण कोई फगुनिया दम नहीं तोड़ेगी क्यूंकि अब ये पहाड़ हीं नहीं रहेगा. इसको तोड़कर हम सड़क बना देंगे. गजब का प्रेम था फगुनिया के लिए, तभी तो 22 वर्ष झोंक दिए. अपने शरीर का रोम-रोम खपा दिए उस प्यार के खातिर. इसलिए दशरथ मांझी असली प्रेम का परिचायक हैं. एक इंटरव्यू में अभिनेता पंकज त्रिपाठी बोलते हैं कि जिंदगी वो हिसाब है जिसे पीछे जाकर ठीक नहीं कर सकते, बेहतर है यहां से ठीक करें, यह हकीकत भी है.
जिद्द आदमी को हर असंभव काम संभव करवा सकता है बस लगन से करते जाइए. संभव काम को संभव तो कोई भी कर सकता है पर जिद्दी व्यक्ति हीं असंभव में संभव नाम का दीया जला सकता है. जिद्द समुद्र के जल की तरह स्थिर तथा गहराई युक्त रहता है, कितने भी तरंग और चक्रवाती तूफान आए पर वह अडिग के भांति टिका रहता है. मगर जिद्द न हो तब वह बाढ़ के पानी के भांति तेज धारा के बहाव में आता है, उथल-पुथल करता है और क्षण भर में लुप्त हो जाता है. यही जिद्द दशरथ मांझी बनाता है तब तो वह अकेले छेनी-हथौड़ी के दम पर हुंकार भरकर 360 फुट लंबी, 30फुट चौड़ी और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को चकनाचुर करके सड़क बना डाली.
उनकी मां संघर्ष के दिनों में कहती थीं कि 12 दिनों में तो घूरे के भी दिन फिर जाते हैं. उनका यही मंत्र था कि अपने धुन में लगे रहो. यही मंत्र दशरथ मांझी अपने जीवन में बांध रखे थे कि अपना काम करते रहो, चींजें मिलें, न मिले इसकी परवाह मत करो. हर रात के बाद दिन तो आता हीं है. सूर्य अस्त के बाद उदय तो होता ही है.
दशरथ मांझी ने अपने धर्मपत्नी को खोकर प्रण लिया कि किसी और की बेटी-बहू, मां, बच्चे, बुजुर्ग, इस उंची पहाड़ी पर चढ़कर अपनी जान नहीं गवाएंगे. अपनी फगुनिया को खोने का तड़प तो था हीं साथ ही साथ वर्तमान पीढ़ी के लोगों की भी चिंता थी. उस इलाके के लोगों के रक्षा के लिए उन्होंने निश्चय किया कि पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने का जिम्मा मुझे हीं लेना होगा. सरकार या किसी और व्यक्ति के भरोसे नहीं बैठेंगे. कितना परिश्रम किया होगा, क्या परेशानी आई होगी, कैसे -कैसे कष्ट आए होंगे, कितना प्रताङित हुए होंगें.
मांझी_द_माउण्टेन_मैन फिल्म देखने पर आंसू नहीं रूकते हैं. हम लोग सिर्फ सोंच सकते हैं, आश्चर्य कर सकते हैं..क्यूंकि अब के मनुष्य में महसूस करने की क्षमता भी नहीं रही. बाकी कर तो नहीं हीं सकते हैं क्योंकि आज की पीढ़ी को एक क्यारी खोदने में हड्डी-पसली बाहर आ जाता है. एक क्यारी छोङ दीजिए एक गमला में फूल खुरपी से खोदने में दम फूलने लगता है.
हौसला टाईट तो संभव हीं नहीं है, भले हवा-टाईट जरूर हो जाता है. पहाड़ काटने का तो सोच कर आदमी दम तोड़ दे, उसमें भी अगर छेनी-हथौङी से तब वह .......?? किस लिए 22 वर्ष दूसरे के लिए खपाएं? अरे! हमरे परिवार के साथ जो होना था वह हो गया. बस इंग्लिश में That's all कहके हाय-तौबा मचाते हुए, दुनिया जहान को कोसते रहेंगे.
मित्र भरत जी के साथ में जब हम पूज्यनीय श्रद्धेय दशरथ मांझी के प्रतिमा का दर्शन करने के पश्चात उनके द्वारा पहा़ड़ तोड़कर रास्ता बने हुए जगह का अवलोकन कर रहे थे तब वह बोलते हैं कि जानते हैं कोई भी काम 'संकल्प' से होता है, न कि ताकत और पहलवानी से.
नहीं तो दुनिया में एक-से-एक गामा पहलवान और ताकतवर लोग हुए पर कहां किसी ने पहाड़ तोड़ दिया और आज भी कोई भी बलशाली या सुरमा लोग नहीं तोड़ पाएगा. यहां तक कि इस असंभव और अभूतपूर्व कार्य के बारे में कोई भी व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है. आज की पीढ़ी क्यूं ना कितना भी ड्राई फ्रूट्स व 36 ठो व्यंजन पा ले और कितना भी जिम में कसरत कर ले पर जबतक उसमें संकल्प नहीं होगा तब तक इस तरह का चुनौतिपूर्ण कार्य करने की सोच भी नहीं उत्पन्न होगी, वहीं करना तो और दूसरी बात है. संकल्प आदमी को क्षण भर में संभव काम को असंभव करवा देता है.
दुष्यंत कुमार की एक पंक्ति याद आती है कि :-
"एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें ना देख.
राख, कितनी राख है चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिंगारियां हीं देख, अंगारे न देख..
तुलसी गबार्ड की जीवनी, उम्र, ऊंचाई, करियर, पति, बच्चे, कुल संपत्ति
तुलसी गबार्ड की जीवनी, उम्र, ऊंचाई, करियर, पति, बच्चे, कुल संपत्ति: इस लेख में आप तुलसी गबार्ड के बारे में सब कुछ जानेंगे।
तो तुलसी गबार्ड कौन है? तुलसी गबार्ड एक अमेरिकी राजनीतिज्ञ, यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी रिजर्व अधिकारी और राजनीतिक पंडित हैं, जिन्होंने 2013 से 2021 तक हवाई के दूसरे कांग्रेस जिले का प्रतिनिधित्व किया। गबार्ड कांग्रेस के पहले हिंदू सदस्य और मतदान में अमेरिकी कांग्रेस के पहले समोआ सदस्य थे।
कई लोगों ने तुलसी गबार्ड के बारे में बहुत कुछ सीखा है और इंटरनेट पर उनके बारे में कई खोजें की हैं।
यह लेख तुलसी गबार्ड और उनके बारे में जानने लायक हर चीज़ के बारे में है।
तुलसी गबार्ड की जीवनी
यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस की पहली हिंदू पूर्व सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी की 2020 की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार तुलसी गबार्ड भारतीय मूल की हैं। सच तो यह है कि वह भारतीय मूल की नहीं हैं. उन्होंने पहले ट्विटर के जरिए खुलासा किया था कि वह भारतीय मूल के नहीं हैं। तुलसी गबार्ड का जन्म 12 अप्रैल 1981 को संयुक्त राज्य अमेरिका के लेलोआलोआ में हुआ था।
तुलसी गबार्ड का जन्म अमेरिकी राज्य हवाई में एक अमेरिकी सामोन परिवार में हुआ था। उनके पिता कैथोलिक थे जबकि उनकी मां हिंदू बन गईं। तुलसी गब्बार्ड भी हिंदू बन गईं. उन्होंने भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते सुधारने की वकालत की. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में उनके चुने जाने पर बधाई भी दी.
तुलसी गबार्ड दोस्त
तुलसी गबार्ड की उम्र कितनी है? तुलसी गबार्ड 41 साल की हैं. तुलसी का जन्म 12 अप्रैल 1981 को लेलोआला, अमेरिकी समोआ में हुआ था।
तुलसी गबार्ड की ऊंचाई
तुलसी गबार्ड कितनी लंबी हैं? तुलसी गबार्ड 1.50 मीटर लंबी हैं।
तुलसी गबार्ड के माता-पिता
तुलसी गबार्ड के माता-पिता कौन हैं? तुलसी गबार्ड का जन्म माइक गबार्ड और कैरोल पोर्टर गबार्ड से हुआ था।
तुलसी गबार्ड के पति
क्या तुलसी गबार्ड शादीशुदा हैं? तुलसी गबार्ड का विवाह अब्राहम विलियम्स से हुआ है। उन्होंने 2015 में शादी कर ली। लेकिन बाद में तुलसी ने 2002 में एडुआर्डो तामायो से शादी कर ली, लेकिन उनकी शादी केवल चार साल तक चली।
तुलसी गबार्ड, भाई-बहन
तुलसी गबार्ड के भाई-बहनों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
तुलसी गबार्ड के बच्चे
तुलसी गबार्ड के बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, हालाँकि उनकी और उनके पति अब्राहम विलियम्स की शादी 2015 से हो चुकी है।
करियर तुलसी गबार्ड
2011 से 2012 तक होनोलूलू के कॉन्सिल म्यूनिसिपल की घेराबंदी। मैंने 2012 में कांग्रस एटैट्स-यूनिस की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह फोर्सेज आर्मीज़ और अफेयर्स एटरेंजर्स डे ला चैंब्रे के प्रतिनिधियों के लिए एक आयोग का सदस्य है। यूएसए।
वह 2012 में संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गईं और हिंदू पुस्तक गीता को साक्षी के रूप में उपयोग करके संयुक्त राज्य सीनेट में इतिहास रचा। तुलसी गीता को अपना मार्गदर्शक मानती हैं और अपने जीवन में सद्भाव बनाए रखने के लिए नियमित रूप से इसका पाठ करती हैं। 2016 में 1 लाख 40 हजार वोट हासिल करने के बाद वह अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए फिर से चुनी गईं।
फरवरी 2019 में, उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपने 2020 के राष्ट्रपति अभियान की घोषणा की, और संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए दौड़ने वाली पहली महिला लड़ाकू अनुभवी बन गईं। वह मार्च 2020 में सेवानिवृत्त हुए और राष्ट्रपति पद के लिए पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडेन का समर्थन किया।
तुलसी गबार्ड इंस्टाग्राम
इंस्टाग्राम पर तुलसी गबार्ड के 782,000 फॉलोअर्स हैं। उनका उपयोगकर्ता नाम @तुलसीगबार्ड है।
तुलसी गबार्ड नेट वर्थ
Sssamiti के अनुसार, तुलसी गबार्ड की अनुमानित कुल संपत्ति $30 मिलियन है।
जर्मनी, स्वीडन से लेकर अमेरिका तक ट्रम्प और उनके परिवार का इतिहास
डोनाल्ड ट्रंप के जर्मन दादा अमेरिका क्यों गए?
ट्रम्प
के जर्मन दादा ने सैन्य
सेवा से परहेज किया
और प्रवास किया। एक इतिहासकार नाई
के प्रशिक्षु के मार्ग का
पता लगाता है।
कैसरस्लॉटर्न
के इतिहासकार रोलैंड पॉल सलाह देते
हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प
को मेक्सिको और इस्लामिक देशों
के अप्रवासियों के खिलाफ बोलते
समय थोड़ा अधिक सावधान रहना
चाहिए। "ऐसा लगता है
कि वह भूल गए
हैं कि उनके अपने
दादा पैलेटिनेट के एक आप्रवासी
थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि को
अवैध रूप से छोड़
दिया था।" कल्स्टेड एन डेर वेनस्ट्रैस
के फ्रेडरिक ट्रम्प (1869-1918) ने संयुक्त राज्य
अमेरिका में "रेस्तरां और वेश्यालयों और
रियल एस्टेट से" पैसा कमाया था।
,'' पॉल कहते हैं, जो
जर्मन-अमेरिकी प्रवासन इतिहास के विशेषज्ञ हैं।
कैसरस्लॉटर्न
में इंस्टीट्यूट फॉर पैलेटिनेट हिस्ट्री
एंड फोकलोर के पूर्व निदेशक
ने पुरानी फाइलों को खंगाला और
पता लगाया कि ट्रम्प परिवार
ने नई दुनिया में
धन और राजनीतिक प्रभाव
कैसे हासिल किया। उनका निष्कर्ष: चमकदार
रिपब्लिकन अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार
और रियल एस्टेट अरबपति
डोनाल्ड ट्रम्प, जो आम आदमी
के प्रवक्ता के रूप में
कार्य करना पसंद करते
हैं, घोंसले में बैठ गए।
दादाजी
ने डेमोक्रेट्स का समर्थन किया
क्योंकि
हेयरड्रेसर के रूप में
प्रशिक्षण के बाद उन्हें
नौकरी नहीं मिली, ट्रम्प
के दादा फ्रेडरिक 1885 में
पैलेटिनेट से, जो बवेरिया
साम्राज्य का हिस्सा है,
अमेरिका चले गए - ठीक
से पंजीकरण रद्द किए बिना।
पॉल का कहना है
कि 16 वर्षीय सिपाही को शायद उत्प्रवास
परमिट नहीं मिला होगा।
न्यूयॉर्क में, ट्रम्प ने
अंततः पश्चिम में अपना भाग्य
तलाशने से पहले एक
हेयरड्रेसर की दुकान में
काम किया।
ट्रम्प
वाशिंगटन के सिएटल में
एक रेस्तरां चलाते थे। 1892 में वह प्राकृतिक
बन गये और उन्होंने
अपना पहला नाम बदलकर
फ्रेडरिक रख लिया। वह
सोने और चांदी के
खनन वाले शहर मोंटे
क्रिस्टो में एक होटल
और वेश्यालय चलाता था। वहां, ट्रम्प
ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अभियान में क्षेत्रीय डेमोक्रेटिक
उम्मीदवार के लिए प्रचार
किया और 27 साल की उम्र
में खुद "जस्टिस ऑफ द पीस"
चुने गए। 1898 में, सोने की
भीड़ से प्रभावित होकर,
भाग्य के सिपाही ने
"खनिकों" का उत्तर की
ओर पीछा किया।
ट्रम्प
ने संदिग्ध प्रतिष्ठा वाला होटल खोला
उन्होंने कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में लेक बेनेट पर संदिग्ध प्रतिष्ठा वाला एक रेस्तरां और होटल खोला। इतिहासकार पॉल कहते हैं, घर ने न केवल अपने अच्छे व्यंजनों का विज्ञापन किया, बल्कि "महिलाओं के लिए निजी बक्से" का भी विज्ञापन किया।
अपनी
पुरानी मातृभूमि की यात्रा के
दौरान, फ्रेडरिक की मुलाकात अपनी
पत्नी एलिजाबेथ से हुई, जिनसे
उन्होंने 1902 में लुडविगशाफेन में
शादी की। दंपति न्यूयॉर्क
चले गए, लेकिन एलिज़ाबेथ
को घर की याद
आने लगी। "होटल कीपर" ट्रम्प
अपने परिवार और अपने सामान
में 80,000 मार्क्स की संपत्ति के
साथ वापस कल्स्टेड गए,
जहां उन्होंने 1904 में पुनर्प्राकृतिककरण के लिए
आवेदन किया था। लेकिन
अधिकारियों ने उसे संयुक्त
राज्य अमेरिका निर्वासित कर दिया: इसका
कारण यह था कि
वह छिपकर भाग गया था
और सैन्य सेवा से बच
गया था।
डोनाल्ड
ट्रम्प के पिता ने जर्मन मूल से इनकार किया
1905 में,
फ्रेडरिक ट्रम्प अपने परिवार के
साथ न्यूयॉर्क लौट आये। वह
एक होटल के प्रबंधक
बन गए और एक
रियल एस्टेट उद्यमी के रूप में
काम किया। 30 मई, 1918 को स्व-निर्मित
व्यक्ति की स्पेनिश फ्लू
से मृत्यु हो गई।
उनके
बेटे फ्रेड सी. ("फ्रेडी") 1920 के दशक में
अपने पिता के रियल
एस्टेट व्यवसाय में शामिल हो
गए, जिसे उनकी मां
एलिज़ाबेथ ने जारी रखा।
उन्हें राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट द्वारा
शुरू किए गए सार्वजनिक
आवास कार्यक्रम, मकान निर्माण और
आवास विकास से लाभ हुआ।
फ़्रेडी ने अपने जर्मन
मूल से इनकार किया
और दावा किया कि
उसका परिवार स्वीडन से आया है।
फ्रेडी
की स्कॉटिश मैरी एन मैकलियोड
(1912-2000) से शादी के परिणामस्वरूप
पांच बच्चे हुए - जिनमें डोनाल्ड ट्रम्प भी शामिल हैं,
जो अब 70 वर्ष के हैं।
इतिहासकार पॉल का कहना
है कि जब बिल्डिंग
ठेकेदार फ्रेड सी. ट्रम्प की
1999 में न्यूयॉर्क में मृत्यु हो
गई, तो वह अपने
पीछे $250 से $300 मिलियन की संपत्ति छोड़
गए। उनका बेटा डोनाल्ड
लंबे समय से उनके
नक्शेकदम पर चल रहा
था।
कहानी उस बहादुर भारतीय सैनिक की, जिसने एक हजार रुपए के बदले में ले लिया था आधा पाकिस्तान
कहानी उस बहादुर भारतीय सैनिक की, जिसने एक हजार रुपए के बदले में ले लिया था आधा पाकिस्तान
1971 की जंग में पाकिस्तान को हराने और नया मुल्क बांग्लादेश बनाने का पूरा श्रेय सिर्फ एक ही शख्स को जाता है। वो हैं फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ। ये भारतीय सेना के इस लीडर की ही ताकत थी, जिसने जंग खत्म होने के बाद पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया था। उनकी शरारतों और मजाक के कई किस्से आज भी बेहद मशहूर हैं। वो भारत के एक ऐसे आर्मी चीफ थे, जो उस समय की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की बात काटने से भी नहीं डरते थे। इतना ही नहीं, वो इंदिरा गांधी को स्वीटी तक कह डालते थे।
एक मोटरसाइकिल के बदले ले लिया आधा पाकिस्तान...
- सैम मानेकशॉ का पाकिस्तानी राष्ट्रपति से भी जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर हैं। दरअसल, मानेकशॉ और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान एक साथ फौज में थे और दोस्त हुआ करते थे।
- उस समय मानेकशॉ के पास एक यूएस मेड मोटरसाइकिल हुआ करती थी। देश का बंटवारा हुआ तो याह्या खान पाकिस्तान फौज में चले गए। वहीं, मानेकशॉ भारत में रहे।
- लेकिन याह्या खान ने जाते-जाते मानेकशॉ से ये अमेरिकी मोटरसाइकिल 1000 रुपए में खरीद ली। लेकिन पैसे नहीं चुकाए। समय बीतता गया। मानेकशॉ भारत के आर्मी चीफ बने तो पाकिस्तान में याह्या खान ने सरकार का तख्तापलट कर राष्ट्रपति बन गए।
- 1971 की जंग में पाकिस्तान के सरेंडर करने के बाद मानेकशॉ ने कहा था कि याह्या ने आधे देश के बदले में उनकी मोटरसाइकिल का दाम चुका दिया।
फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जीवन परिचय और उनकी बहादुरी से जुड़े कुछ अनोखे किस्से
सैम मानेकशॉ हमारे देश में शौर्य, जांबाजी और दृढ़ निश्चय का जीता-जागता उदाहरण थे। ये वही इंसान थे, जिनके नेतृत्व में 1971 में भारत की सेना ने मात्र 13 दिनों में पाकिस्तान को अपने घुटनों पर ला दिया था। सैम मानेकशॉ ने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1971 के भारत-पाक युद्ध तक कई युद्ध लड़े और हर युद्ध में जबरदस्त बहादुरी का परिचय दिया था।
सैम मानेकशॉ एक पारसी परिवार में जन्मे थे, जिनके पिता खुद एक डॉक्टर थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पहले डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन पिता के मना करने पर उन्होंने फिर सेना जॉइन की।
सैम मानेकशॉ का जीवन और उनसे जुड़े कुछ अनोखे किस्से -
| जन्म: | 3 April 1914, अमृतसर, पंजाब |
| पिता: | हॉरमुसजी मानेकशॉ |
| माता: | हिला नी मेहता |
| सेना में पद: | फील्ड मार्शल |
| सम्मान: | पद्म भूषण, पद्म विभूषण |
| मृत्यु: | 27 June 2008 |
ऐसा था सैम बहादुर का शुरुआती जीवन
सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था। सैम के माता-पिता उनके जन्म से पहले से मुंबई में रहते थे। सैम के पिता का नाम हॉरमुसजी मानेकशॉ था, जो कि एक डॉक्टर थे।
हॉरमुसजी के एक दोस्त लाहौर में रहते थे, उनके कहने पर 1903 में हॉरमुसजी मुंबई से लाहौर के लिए निकल गए थे। उस समय उनकी पत्नी हिला नी मेहता गर्भवती थी। जब ट्रैन अमृतसर पहुंची, तब उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी तथा डॉक्टर ने उन्हें यात्रा करने के लिए मना कर दिया। उसके बाद हॉरमुसजी और उनकी पत्नी ने अमृतसर में ही रुकने का फैसला कर लिया। वहीं पर हॉरमुसजी ने अपना क्लिनिक और फार्मेसी शुरू की। अगले 10 सालों में दंपत्ति के 6 बच्चे हुए, जिनमें से सैम पांचवें नंबर के थे।
सैम की प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में हुई और फिर अपन ग्रेजुएशन करने के लिए वे नैनीताल चले गए। शुरुआत में सैम गायनेकोलॉजिस्ट बनना चाहते थे, लेकिन उनके पिता के मना करने पर वे सेना में भर्ती हो गए। अपनी जांबाजी के दम पर धीरे धीरे वे फील्ड मार्शल के पद पर पहुंचे।
फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के जीवन के कुछ किस्से बड़े मजेदार हैं और कुछ हिस्से बहुत ही प्रेरणादायी हैं। जानिये कुछ ऐसे ही किस्सों के बारे में –
7 गोलियां लगने के बाद भी हँसते रहे
सैम मानेकशॉ 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के कैप्टन बने। 1942 में जब वे बर्मा में जापान के खिलाफ लड़ रहे थे, तब उन्हें दुश्मनों की कई गोलियों ने छलनी कर दिया। कई गोलियां लगने के बाद भी वे लगातार लड़ते रहे। जब वे लड़ते-लड़ते थककर गिर गए, तब अंग्रेज मेजर जनरल डेविड कोवान ने अपनी वर्दी से मिलिट्री क्रॉस निकालकर उन्हें दे दिया। मिलिट्री क्रॉस कभी भी मरणोपरांत नहीं दिया जाता था। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि तुम कुछ समय में मरने वाले हो, इसलिए मैं अपना क्रॉस तुम्हें दे रहा हूँ।
एक भारतीय सिपाही शेर सिंह सैम मानेकशॉ को अपने कंधे पर लेकर एक ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर के पास पहुंचा। ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर ने सैम का इलाज करने के लिए मना कर दिया, क्योंकि उसे लग रहा था कि सैम के बचने के कोई चांसेस नहीं है। लेकिन डॉक्टर पर दबाव डालने पर उसने सैम की जांच की, तो उसे पता लगा कि सैम के लंग्स, किडनी और लीवर में कुल 7 गोलियां लगी थी। जब डॉक्टर ने उनसे पूछा कि तुम्हें क्या हुआ है, तब सैम ने जवाब दिया कि एक खच्चर ने मुझे लात मार दी है। सैम का इलाज शुरू हुआ और वे मौत को हराकर जिन्दा वापस आ गए और फिर से देश की सेवा में लग गए।
सैम मानेकशॉ ऐसे बने सैम बहादुर
1969 में सैम सेनाध्यक्ष बने, जुलाई 1969 में सैम 8 गोरखा राइफल्स की एक बटालियन के दौरे पर गए थे। वहां पर उन्होंने एक गोरखा जवान से पूछा कि क्या तुम मुझे जानते हो, वो जवान इतने बड़े अधिकारी को देखकर थोड़ा सा घबरा गया। ऐसे में उसने सैम मानेकशॉ को सैम बहादुर कहा। सैम ने उस जवान को गले लगाया और उसके बाद से वे हमेशा सैम बहादुर के नाम से जाने गए।
जब इंदिरा गांधी का आदेश नकार दिया था
पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) पाकिस्तान से अपनी आजादी के लिए जंग लड़ रहा था। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना लगातार अत्याचार कर रही थी, जिसके चलते पूर्वी पाकिस्तान के कई लोग शरणार्थी बनकर भारत में आ रहे थे। उस समय इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थी और वो इस स्थिति को लेकर काफी चिंतित थी। 27 अप्रैल 1971 को इंदिरा गांधी ने एक आपात बैठक बुलाई, सैम भी सेनाध्यक्ष होने के नाते इस बैठक में शामिल हुए।
इंदिरा जी ने सैम को आदेश दिया कि पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना दखल दे, तब सैम ने इंदिरा जी का आदेश मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने इंदिरा जी से युद्ध की तैयारी के लिए कुछ समय माँगा, इंदिरा जी ने उन्हें तैयारी के लिए समय दे दिया। बाद में जब युद्ध हुआ, तो उसका परिणाम जगजाहिर है।
पाकिस्तान के बंदी सैनिकों का रखा ध्यान
जब 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारत के सामने सरेंडर कर दिए, तब जितने भी पाकिस्तानी सैनिक युद्धबंदी बनाए गए थे, सैम मानेकशॉ ने आदेश दिया था कि सभी पाकिस्तानी सैनिकों का सही तरीके से ख्याल रखा जाए।
उस समय युद्धबंदियों के लिए पक्के मकान दिए गए, जबकि भारतीय सैनिक बाहर खुले में सोते थे। जो भी खाना बनता था, वो पहले पाकिस्तानी सैनिकों को दिया जाता था, उसके बाद बचा हुआ खाना भारतीय सैनिकों को दिया जाता था। उन्हें पढ़ने के लिए कुरान भी दी गयी थी, इस तरह से सैम मानेकशॉ ने दुश्मन सैनिकों के साथ भी मानवीय व्यवहार किया था।
इंदिरा गांधी का विरोध करने में सबसे आगे
- फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने एक बार इंटरव्यू में बताया था कि इंदिरा गांधी पूर्वी पाकिस्तान के हालात को लेकर काफी परेशान थीं। सबसे बड़ी समस्या पूर्वी पाकिस्तान से भारत आ रहे शरणार्थी थे। मानेकशॉ ने बताया कि 27 अप्रैल को इंदिरा ने आपात बैठक बुलाई और लोगों को अपनी परेशान बताई। इस मीटिंग में मानेकशॉ भी बैठे थे।
- इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान में इंडियन आर्मी को दखल देने की बात कही तो, मानेकशॉ ने तुरंत इसका विरोध कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि इसके लिए उनकी आर्मी तैयार नहीं है। जंग हुई तो देश को बहुत नुकसान होगा। हमें तैयारी का मौका दें, जब जंग करनी होगी, वह बता देंगे। मानेकशॉ के ऐसे तीखे तेवर देखकर इंदिरा गांधी चुप हो गईं।
इंदिरा गांधी को स्वीटी कहने की हिमाकत
- मानेकशॉ और इंदिरा गांधी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से कई किताबों में शामिल किए गए हैं। उन्हीं में से एक किस्सा स्वीटी भी है। एक तरफ जब इंदिरा गांधी के सामने लोग कुछ भी कहने से डरते थे, आर्मी चीफ मानेकशॉ उन्हें स्वीटी कहकर बुलाते थे।
- 1971 में जंग के लिए जब एक बार फिर इंदिरा ने अपने आर्मी चीफ से पूछा तो मानेकशॉ ने कहा कि मैं हमेशा तैयार हूं स्वीटी। इंदिरा गांधी जानती थीं कि मानेकशॉ जैसे लीडर की दम पर ही वो पूर्वी पाकिस्तान में जंग जीत सकती हैं। इसलिए वो उनके सारे नखरे सहती थीं।
जब भारत में उड़ी तख्तापलट की अफवाह
- इंदिरा गांधी अपनी लीडरशिप, पॉलिटिक्स और ब्यूरोक्रेसी के कंट्रोल को लेकर हमेशा सतर्क रहती थीं। एक बार अफवाह फैली कि मानेकशॉ आर्मी की मदद से सरकार का तख्तापलट करने की फिराक में हैं। इससे इंदिरा काफी डर गई थीं।
- उन्होंने मानेकशॉ को मीटिंग पर बुलाया और इस बारे में सवाल किए तो आर्मी चीफ ने कड़क अंदाज में इंदिरा को जवाब दिया। उन्होंने कहा- मेरी और आपकी दोनों की नाक बड़ी लंबी है। मगर मैं दूसरे के काम में अपनी नाक नहीं अड़ाता। इसलिए आप भी मेरे काम में नाक न डालें।
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